दोस्ती के नाम : 09




दोस्ती के नाम :  09

' दोस्ती '- ये शब्द बड़ा ही निराला है ..... कहने को महज़ एक शब्द लेकिन हर किसी के लिये अलग - अलग  अर्थ ......कोई कहे ज़िंदगी ...कोई कहे बंदगी ..... कोई कहे निभाना है इसे आसान ..... कोई माने निभाना इसको है बेहद मुश्किल ........ क्या है सही परिभाषा दोस्ती की ............ आइए दोस्ती के इस प्यारे से , खट्टे - मीठे से रिश्ते को निम्न पंक्तियों के द्वारा  समझने की कोशिश करते हैं .

आज खुशियों की कोई बधाई देगा
निकला है चाँद तो दिखाई देगा
ऎ दोस्त दोस्ती की है हमने आपसे
आपका एक आँसु भी गिरा तो सुनाई देगा..........


तेरी दोस्ती में खुद को महफूज़ मानते हैं
हम दोस्तों में तुम्हें अज़ीज़ मानते हैं
तेरी दोस्ती के साये में ज़िंदा हैं
हम तो तुझे खुदा का दिया हुआ ताबीज़ मानते हैं............


तेरी पलकों पे ख्वाब रख गया कोई
तेरी साँसों पे नाम लिख गया कोई
चलो वादा रहा भूल जाना हमें
अगर हमसे अच्छा यार तुम्हें मिल गया कोई..........


तेरी दोस्ती में एक नशा है
तभी तो ये सारी दुनिया हमसे खफा है
ना करो हमसे इतनी दोस्ती
कि दिल ही हमसे पूछे तेरी धड़कन कहाँ है .............

कुछ ऐसी ही होती है दोस्ती. दोस्ती का रिश्ता बेहद रोचक , अटूट व अनमोल होता है ..... दोस्ती तब और भी अनमोल बन जाती है जब आपके दोस्त बचपन से आपके साथ हों ......साथ- साथ पढ़ना- बढ़ना, खेलना- कूदना , हँसी मज़ाक , एक दूसरे को समझना , मदद करना, एक दूसरे की भावनाओं का आदर करना व सुख - दुख में साथ रहना .....और जीवन पर्यंत साथ निभाना... यही कुछ वाक्य दोस्ती के रिश्ते को परिभाषित करते हैं.

आज दोस्ती के नाम की नौवीं श्रृंखला के द्वारा  जिस शख्सियत से आप सभी को रुबरु कराने जा रहा हूँ वे हैं मेरे बेहद प्रिय दोस्त - 'श्री पवन प्रताप सिंह चौहान '  जी .










अब इनके व्यक्तित्व  की क्या तारीफ करें ........... श्याम वर्ण , लगभग 6 फीट लंबाई , बड़ी- बड़ी बेहद मासूम निगाहें जिनमें निष्कपटता साफ तौर पर दिखाई देती है .... .. राजसी व्यक्तित्व, भोला- मासूम चेहरा, बेधड़क व स्वतंत्र विचार और मनमोहक मुस्कान यही है श्री पवन प्रताप सिंह चौहान जी की पहचान .

पवन के बातचीत का लहज़ा बेहद प्यारा है . आप अगर इनसे पहली बार मिलें तो आपको अहसास भी नहीं होगा कि आप इनसे पहली बार मिल रहे हैं.... बेहद सहजता व सरलता से सामने खड़े अजनबी को पल भर में अपना दोस्त बना लेने की क्षमता रखते हैं - मेरे प्रिय मित्र श्री पवन जी! 


वैसे तो पवन से मेरी मुलाकात कक्षा आठवीं में हुई थी पर अलग - अलग सेक्शन में होने के कारण हमारी कभी बात नहीं हुई . 11वीं कक्षा वाणिज्य संकाय में हम एक साथ पढ़ने लगे.  मैं कक्षा का मॉनिटर था ........ एक सख्त व खड़ूस मॉनिटर ..... पर यहाँ मैं यह बताना चाहूँगा कि पवन ने मुझे कभी मौका ही नहीं दिया कि मैं कभी उसका नाम अनुशासनहीनता के कारण ब्लैक बोर्ड पर लिखूँ या टीचर से शिकायत करूँ.
लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि पवन शरारती नहीं था . वो शरारती था .......लेकिन पवन के व्यक्तित्त्व में शरारत के साथ- साथ गंभीरता भी विद्यमान थी.




 

पढ़ाई के साथ -साथ खेल- कूद में भी वह महारथी था. मेरी याद में स्कूल डेस में ही उसने खेल - कूद के क्षेत्र में न जाने कितने ही मेड्ल्स , अवार्ड आदि की झड़ी लगा दी थी.
इसके अलावा पवन को लेखन का भी बहुत शौक़ था. मैंने उसकी कुछ शायरी व कवितायें पढ़ीं थीं सच बताऊँ तो पवन की कवितायें पढ़ने से पहले मैं सिर्फ खुद को ही विभिन्न कलाओं का महारथी मानता था.......... लेखन की यदि बात करें तो इसमें मुझे बेहद दिलचस्पी थी और है और ईश्वर की कृ्पा से जैसा कि आप सभी पाठकों का प्रेम और आशार्वाद प्राप्त होता है, तो उससे यह भी साफ हो जाता है कि भइया ! " कुछ बात तो है हममें ......... जो सदियों तक हस्ती हमारी मिटती नहीं ............ पीछे पड़े दुश्मन अनेक ........ कतार उनकी घटती नहीं ...... घुटाती है उनको तरक्की हमारी.........पर दुश्मनों को जला के खाक कर दे .........कुछ ऐसी ही है शख्सियत  हमारी. "  


हा हा हा हा हा हा........... स्कूल डेस से मेरा तो बस यही मंत्र है और अपनी ज़िंदगी जीने का अंदाज़ भी कुछ ऐसा ही है...... लोग मुझे घमंडी,Reserved, Egoist कहते हैं...... और मैं हँसता हूँ क्योंकि हाँ, मैं घमंडी हूँ क्योंकि मेरी नज़रों में मेरा यह घमंड , असल में मेरा आत्मविश्वास है , गुरुर है .... गर्व है अपनी  कलाओं पर , अपने आप पर , अपनी क्षमताओं पर ..... अपने विश्वास पर ....... ईश्वर का साक्षात हाथ है मुझ पर ........ देवी माँ की कृ्पा का ही तो परिणाम है कि इतनी सारी कलायें उन्होंने मुझे वरदान के रुप में प्रदान की हैं ...... पर मेरा घमंड किसी और के लिए घातक नहीं....... मैं दूसरों की कलाओं का .......... दूसरों की शख्सियत का सम्मान करना जानता हूँ और खुद को भी सम्मान देने में यकीन रखता हूँ. 


खैर, अपनी तारीफें तो बहुत हो गईं  ........... तो जब मैंने एक दिन कक्षा में पवन के द्वारा रचित कुछ कवितायें पढ़ीं तो कुछ हद तक मेरी ईगो हर्ट हुई थी.......  असल में सकूल डेस में मुझे लगता था कि शायद ही कोई छात्र ऐसा हो जो मेरे ट्क्कर की लेखनी में पारंगत हो ....... पर पवन की रचनायें वाकई बहुत दिल से लिखी गईं थी ...... उनमें गहराई थी ..... मौलिकता थी..... नवीनता थी. फिर अगले ही पल मुझे खुशी भी हुई कि चलो देर से ही सही पर कोई तो ऐसा दोस्त मिला जिससे मैं जीवन पर्यंत जुड़ना चाहूँगा क्योंकि ऐसे दोस्तों से जुड़ कर मुझे गर्व की अनुभूति होगी और मैं कह सकता हूँ कि " हाँ ये है मेरा दोस्त पवन ! " .


हमारा एक फंडा था जिसमें हम दोनों की सहमति रहती थी कि ' हेलो हाय छोड़िये और जय माता दी बोलिए !' ............ हम जब भी मिलते थे तो सबसे पहले शब्द जो मुख पर आते, वे थे " जय माता दी ! भाई ! "
स्कूल के बाद हमारी कभी मुलाकात नहीं हुई.... बी. एड की शिक्षा सफलतापूर्वक संपूर्ण करने के साथ पवन अध्यापन के क्षेत्र में अग्रसर हैं ........ जगजीत सिंह जी के बहुत बड़े फैन हमारे प्रिय मित्र आज भी समय मिलने पर अपने कलम की धार को पन्नों पर चला ही लेते हैं ...... ईश्वर की मर्जी हुई तो जल्द ही इनकी कुछ रचनाओं को 'अतिथि ब्लॉग' के तौर पर अपने ब्लॉग पर जरुर स्थान दूँगा. 


पवन एक अच्छे दोस्त की भाँति मेरी पेटिंग्स व लेखन का प्रशंसक है ....... जब कभी भी हमारी बात होती है तो पुरानी यादें ताज़ा हो जाती हैं . दोस्ती के कुछ अनमोल पलों को संजो कर रख सकूँ इसलिये 'दोस्ती के नाम' की नौवीं श्रृंखला को 'पवन' के नाम कर रहा हूँ ........ उम्मीद है दोस्ती के नाम ये जाम सभी पाठकों के गले आसानी से उतर जाए ......... और हमेशा की तरह पाठकों के प्रेम और प्यारी - प्यारी टिप्पणियों द्वारा  मुझे और बेहतर लिखने की और कलाकारी करने की  प्रेरणा मिलती रहे . बस इसी आशा के साथ आप सभी अपना ख्याल रखियेगा ....... मुझे और मेरे व्लॉग को सदैव याद रखियेगा .






आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :


                                                      - ऋषभ शुक्ल


copyright©2012-Present Rishabh Shukla.All rights reserved
No part of this publication may be reproduced , stored in a  retrieval system or transmitted , in any form or by any means, electronic, mechanical, photocopying, recording or otherwise, without the prior permission of the copyright owner.
 

Copyright infringement is never intended, if I published some of your work, and you feel I didn't credited properly, or you want me to remove it, please let me know and I'll do it immediately.






Comments

  1. वाह ! शानदार ........................ ऋषभ जी बधाई .
    अनुज

    ReplyDelete
  2. भानु सिंह29 March 2013 at 04:42

    बहुत बढि़या लेख और चित्र . बधाई ऋषभ जी.
    - भानु सिंह

    ReplyDelete
  3. मनोज गुप्ता .29 March 2013 at 04:53

    पवन जी का चित्र बेहद सजीव बनाया है ऋषभ जी आपने . आपके भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनाओं सहित ,
    - मनोज गुप्ता .

    ReplyDelete
  4. अर्पिता सक्सेना.29 March 2013 at 06:27

    सुंदर लेख .... सुंदर यादे .. सजीव चित्रकारी !!!! बधाई व शुभकामनायें आपके उज्जवल भविष्य के लिये .

    - अर्पिता सक्सेना.

    ReplyDelete
  5. बहुत खूबसूरती से आपने एक बार पुन: ' दोस्ती ' के अन्मोल रिश्ते को परिभाषित कर दिया. आभार
    - दीपा

    ReplyDelete
  6. lovely read ..... fabulous blog
    - Minakshi Gaur

    ReplyDelete
  7. माया सिंह29 March 2013 at 06:36

    उत्कृ्ष्ट लेख . बहुत सुंदर चित्र . बधाई
    - माया सिंह, दिल्ली

    ReplyDelete
  8. डॉ . अर्चना पाण्डेय29 March 2013 at 06:36

    माफ कीजियेगा ऋषभ जी .. आपकी एक बात से मैं, सहमत नहीं कि अपने दोस्त पवन की रचनायें पढ़कर आपकी 'ईगो हर्ट' हुई क्योंकि आप खुद कलाकार हैं...बेहतर लेखक है और आपको दूसरों के गुणों की भी इज्जत है ... आपको किसी भी शख्सियत को बेहद खूबसूरती से बयाँ करना आता है व आपको रिश्तों को संजोने की कला में महारथ प्राप्त है..... इसलिए किसी और का बेहतर काम देखकर आपकी ईगो हर्ट तो होना असंभव है .. हाँ ये तो आपकी लेखनी का जौहर है कि यहाँ आप अपना उदाहरण देकर हम पाठकों को ये बाताने की कोशिश कर रहे हैं कि श्री पवन जी की लेखन क्षमता कितनी बेहतरीन होगी कि आप जो कि खुद एक बढिया लेखक है , वो भी पवन जी की रचनाओं के कायल हो गए.....

    वाह ऋषभ जी ! दोस्त हो तो आप जैसा. आप जितने खुद सुंदर हैं उतनी ही आपका हृ्दय भी सुंदर है . बधाई व बेहतर भविष्य की ढ़ेर सारी शुभकामनायें

    डॉ . अर्चना पाण्डेय
    साहित्यकार

    ReplyDelete
  9. Great blog . very well written .Good work !

    Ayush Raheja

    ReplyDelete
  10. डा. बिमल श्रीवास्तव29 March 2013 at 06:38

    प्रिय ऋषभ जी !

    हम उत्तर प्रदेश की एक हिन्दी मासिक पत्रिका के संपादक हैं. आपका ब्लॉग पढा .दोस्ती के नाम की सातवीं सिरीज़ में भी मैंने आपसे अनुरोध किया था कि यदि आपकी अनुमति हो तो हम आपके लेखों को खासकर 'दोस्ती के नाम ' की अभी तक की श्रृंखलाओं को अपनी पत्रिका में प्रकाशित करना चाहते हैं . एक अलग स्तंभ के रुप में . परंतु आपकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली . यदि आप भी इच्छुक हों तो कृ्प्या प्रति लेख के लिये अपने मेहनताना बताने का कष्ट करें .
    आभार

    - डा. बिमल श्रीवास्तव

    ReplyDelete
  11. मिथलेश मिश्रा29 March 2013 at 06:40

    ' हेलो हाय छोड़िये और जय माता दी बोलिए !' आपके इस फंडे से तो हम भी पूर्णतया सहमत हैं ऋषभ जी .
    बढि़या लेख ..दोस्ती की यादें .. दोस्तों की बातें हर किसी के लिए खास होती हैं लेकिन उसे इतनी खूबसूरती से निभाना कोई आपसे सीखे. पवन जी खुशकिस्मत हैं आप के जैसा दोस्त मिला उन्हें . शुभकामनायें.

    मिथलेश मिश्रा, लखनऊ

    ReplyDelete
  12. bilkul same to same ....very well written blog !! keep it up dear :)

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

Queen of Hearts : Divya Bharti

गायन , वादन तथा नृ्त्य कला .

Angel of Silver Screen, the Venus Queen : Madhubala