Friday, 29 March 2013

दोस्ती के नाम : 10



दोस्ती के नाम :  10

The Three Super  से ऊपर Stars.


दोस्ती के नाम की ये 'दसवीं' श्रृंखला कुछ ज़्यादा ही स्पेशल है क्योंकि असल में ये तीन लोगों की पक्की वाली दोस्ती की एक मीठी सी , प्यारी सी, भोली सी , मासूम सी दास्तान है.  ये कहानी है दो सहेलियों की ........ या यूँ कहूँ दो पहेलियों की ....... जो स्कूल डेस से लेकर आज तक अपनी प्यारी सी दोस्ती को बखूबी निभा रही हैं ...... दोनों में कई बार लड़ाई हुई ...... टकरार हुई....... पर फिर भी दोस्ती कभी खत्म नहीं हुई क्योंकि इन दोनों की दोस्ती के साथ एक बहुत ही स्पेशल व्यक्ति जुड़ा हुआ था जिसका नाम है ऋषभ {अर्थात मैं }  ...... हा हा हा हा हा ........



चलिये हँसी मज़ाक तो बहुत हो गई ...... सच्चाई बताऊँ तो आज दोस्ती की नाम की 'दसवीं'  श्रृंखला को जिन दोस्तों को समर्पित कर रहा हूँ वे हैं मेरी प्यारी बहन स्वप्निल शुक्ल और उनकी सबसे अच्छी दोस्त दिव्या दीक्षित  और इन दोनों का दोस्त और छुटकू भाई ऋषभ {अर्थात मैं } .


स्वप्निल दी की दिव्या दी से पहली मुलाकात कक्षा नौवीं में हुई थी . धीरे धीरे दोस्ती बढ़ी और फिर इनकी दोस्ती पक्की वाली दोस्ती में तबदील हो गई ......जब स्वप्निल दी ने मुझे दिव्या दी से मिलवाया तो मैं भी इनकी दोस्ती में इनका तीसरा पक्का दोस्त बन गया .......दिव्या दी हमेशा ही हमारी इस दोस्ती को 'The Three Super Stars' के नाम से संबोधित किया करती थीं...... 


दिव्या दी मूल रुप से मध्य प्रदेश से हैं ....... उन्हें खेल- कूद में बहुत रुचि थी. उन्होंने हमारे विद्यालय की खेल- कूद प्रितियोगिताओं में कई अवार्डस जीते . मेरी दी स्वप्निल जी बहुत जल्दी क्रोधित हो जाती हैं...... और उस वक़्त उनका मूड बेहतर करना मतलब भूखे शेर के सामने जा खड़े होने के समान होता है पर दिव्या दी अपनी प्यारी सी मुस्कान व मीठी- मीठी बोली द्वारा स्वप्निल दी का गुस्सा पल भर में शांत कर देती थीं......... हमारे विद्यालय में स्वप्निल दी, दिव्या दी और मेरी पक्की दोस्ती के बारे में काफी लोग जानते थे ...... ऐसे में एक बार की बात है जब हम तीनों की दोस्ती की भनक मेरी विद्यालय की कुछ लड़कियों को लग गई ....... उन लड़्कियों का मुझ पर बड़ा वाला 'क्रश' था ...... अब मुझे डायरेक्ट प्रपोज़  करना तो उन लड़कियों के बस की बात थी नहीं और स्वप्निल दी के क्रोध का शिकार बनने की उन लड़्कियों की हिम्मत न हुई तो उन्होंने दिव्या दी से कान्टेक्ट किया ....... उन लड़कियों ने दिव्या दी से मेरे बारे में बात की और मेरे बारे में उनसे जानकारियाँ लेने लगीं कि मेरा स्वभाव कैसा है ..... मुझे क्या पसंद है और क्या नापसंद है आदि ...... जब दिव्या दी ने उन लड़कियों से पूछा कि उन्हें ऋषभ अर्थात मुझमें इतनी दिलचस्पी क्यों है तो उन लड़कियों के हृदय में मेरे लिये कितना स्नेह व प्यार है ,ये सब उन्होंने दिव्या दी के सामने उगल दिया ....... वे लड़कियाँ एकदम पागल थीं तभी शायद दिव्या दी के भोले मासूम चेहरे और मीठी बोली के कारण उनको सब कुछ बता दिया और उसके बाद दिव्या दी ने उन लड़कियों से तो कुछ नहीं कहा ....... बस सीधे स्वप्निल दी को लेकर मेरी क्लास में आ गईं और ठहाके लगा लगा के सारी बातें मुझे और स्वप्निल दी को बता दी ...... और ये सब सुन कर मैं तो शर्म के कारण धरती में घुस गया और स्वप्निल दी की आँखे व मुख रक्त वर्ण का हो गया ...... मैं समझ गया कि 'अब ..... तूफान आएगा $$$$$' ........... मैंने अपने बचाव में स्वप्निल दी से कहा कि,"मैंने कुछ नहीं किया "....... और स्वप्निल दी . ..... मुझे घूरे जा रही थीं और दिव्या दी जोर- जोर से हँसी जा रही थीं ............ उस वक़्त दिव्या दी का वो हँसता हुआ चेहरा देख मुझे एक ही गाना याद आया ...... 'दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है...... उम्र भर का ग़म हमें ईनाम दिया है' ...........  अब ये बताने की जरुरत तो नहीं कि स्वप्निल दी ने घर जाकर मेरा क्या हाल किया होगा .......
उस दिन से दिव्या दी जब भी मेरे सामने आती तो मैं कुढ़ - कुढ कर उन्हें देखता और दिव्या दी गंदे वाले बच्चों की तरह मुझे देख हँसती और वो लड़कियाँ शर्म के मारे मुझसे और दिव्या दी और मेरी दी स्वप्निल से नज़रे चुरा के भागती रहती थीं क्योंकि उन बेवकूफ लड़कियों को समझ आ चुका था कि दिव्या दी ने उनके साथ क्या किया है . 


खैर, वक़्त के साथ मैंने खुद को सँभाला और  मेरे साथ हुए इस अन्याय से उबर पाया जो मेरी ही दोस्त और दी 'दिव्या जी' ने मेरे साथ किया .....
वक़्त बीतता गया ...... अब हम बड़े हो गए थे ........ दिव्या दी और स्वप्निल दी की दोस्ती की लोग सराहना करते थे..... दिव्या दी बहुत सहयोगी स्वभाव की हैं..... बहुत गंभीर व्यक्तित्व भी है उनका ....... स्वप्निल दी, दिव्या दी और मैं जब कभी भी साथ होते तो खूब मस्ती करते.... इस तीन दोस्तों की दोस्ती में किसी चौथे की कभी कोई जरुरत ही नहीं महसूस हुई . पर चूँकि हम तीनों अलग- अलग कक्षा में थे तो इस कारण हमने और भी अन्य दोस्त बना लिये वरना जब भी हम एक साथ होते तो वो अपने आप में एक छोटी सी प्यारी सी दुनिया बन जाती थी  ................ स्कूल डेस खत्म हुए ..सब अपनी - अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ने लगे . स्कूल डेस के बाद हमारी कभी मुलाकात नहीं हुई. हमारी दोस्ती बस याद बन कर रह गई थी. और देखते ही देखते 9 वर्ष बीत गए.

26 मार्च 2013 .........को हम एक बार पुन: मिले ....... जी हाँ 9 साल बीत चुके हैं........पुरानी बातें अक्सर याद आती हैं ......इन 9 सालों में बहुत कुछ बदल गया ....... ज़िंदगियाँ बदल गईं..... कई ज़िंदगियाँ आगे बढ़ गईं तो कई ज़िंदगियाँ थम गईं....... स्कूल डेस के कुछ साथी आज आसमाँ छू रहे हैं तो कुछ गर्त में जा गिरे हैं...... सब कुछ बदल गया पर हम तीनों की ये दोस्ती आज भी वैसी ही है ......


9 वर्षों के उपरांत स्वप्निल दी और मैं दिव्या दी से मिलने उनके मौसा- मौसी जी के घर पहुँचे ....... हम एक - एक जीना चढ़ रहे थे ....... मन में कई प्रकार के विचार हलचल पैदा कर रहे थे ....... अखिरकार हम दिव्या दी के सामने जा खड़े हुए ......... दिव्या दी किचन में अपनी मौसी के साथ गुझिया बनवा रही थीं ...... तभी स्वप्निल् दी की ऊँची - ऊँची हील्स की आहट ने दिव्या दी का ध्यान हमारी ओर खींचा और दिव्या दी अचानक सामने आ खड़ी हुईं .... और दोनों पुरानी पक्की वाली सहेलियाँ एक दूसरे के  गले मिलकर रोने लगीं........ हा हा हा हा मज़ाक कर रहा हूँ ....... स्वप्निल दी और दिव्या दी एक दूसरे से गले लगीं और दिव्या दी ने स्वप्निल दी से कहा, "स्वप्निल्! तुम कितना बदल गई और कितनी ज्यादा सुंदर लग रही हो" ...... स्वप्निल दी ने दिव्या दी से कहा, "दिव्या! तुम भी कितना बदल गई और कितनी प्यारी लग रही हो" ...... दिव्या दी ने फिर स्वप्निल दी से कहा, "स्वप्निल! तुम्हारे बाल कितने लंबे हो गए है .... कैसे मैनेज करती हो" ....... स्वप्निल दी ने दिव्या दी से कहा, "हाँ यार! बाल बहुत लंबे है पर मैनेज करना बड़ा कठिन है ".... फिर स्वप्निल दी ने कहा, " दिव्या ! तुम कितनी फ़िट लग रही हूँ .... कैसे??? जिम या योगा ????" ............ और मैं, इन दोनों खूबसूरत लड़कियों को और इनकी पकाऊ बातों को सुनता ही रह गया ...... अचानक मुझे सुध आई तब मैंने दिव्या दी और स्वप्निल दी की बातों को काटते हुए कहा कि, "अरे भाई!! कोई हमसे भी मिल लो ".....दिव्या दी हँसने लगी ....... मैंने कहा, "हाथ मिलाने में कोई आपत्ति तो नही दिव्या दी!! "....... दिव्या दी ने हँसते हुए कहा. "अरे ऋषभ ! कैसी बात कर रहे हो"...... फिर हाथ मिलाकर हम अंदर लिविंग रुम में पहुँचे......

दिव्या दी स्वप्निल दी की और स्वप्निल दी दिव्या दी की तारीफे कर-कर के थकी जा रहीं थीं और मैं इनकी पकाऊ बातों को सुनकर पका जा रहा था कि अचानक दिव्या दी की मौसी जी आ गईं और फिर उनसे हम लोग बातचीत करने लगे..... मौसी जी भी हम लोगों को पहले से जानती थीं ...... वे भी हमसे बड़ी ही खुशी से मिली ...... मौसी जी बहुत प्यारी है ....... बहुत अच्छा स्वभाव है उनका .... उन्होंने स्वप्निल दी की सुंदरता की तारीफ की और बस स्वप्निल दी ने अपना वो प्रश्न जिसने मेरे दिल व दिमाग में आतंक मचा रखा है वो मौसी जी से भी पूछ लिया .......... और मैं बस एक लंबी साँस लेकर ही रह गया .......


स्वप्निल दी ने दिव्या दी की मौसी जी से पूछा कि ," आँटी जी ! प्लीज़ सच बताइयेगा कि मैं बहुत मोटी हो गई हूँ ना" ...... आँटी ने कहा. "नहीं बेटा ! इतना तो होना ही चाहिये और तुम मोटी तो कहीं से नहीं "....
फिर इधर उधर की बातें होने लगीं पर स्वप्निल दी के खुराफाती दिमाग में खुराफात जाग गई थी. थोड़ी देर बाद आँटी जी के जाने के बाद स्वप्निल दी ने दिव्या दी से पूछना शुरु किया कि, "दिव्या यार ! मैं बहुत मोटी हो गई ना .... इतना अच्छा नियम था मेरा योगा करने का ..... 1 महीने से रुटीन क्या बिगड़ा कि देखो मैं कितनी मोटी हो गई"................. 


असल में बात ये है कि स्वप्निल दी बहुत अधित फिटनेस् फ्रीक हैं और पता नहीं पिछले कुछ समय से उनको कहाँ से ये गलत फहमी हो गई है कि वो दिनों दिन मोटी होती जा रही हैं.... जो केवल उनकी ही गलत फहमी है लेकिन जिसका शिकार मुझे होना पड़ता है ...... दिन भर में लगभग 100 बार तो मुझसे पूछती ही हैं कि, "भइया ! देखो जरा मैं कितनी मोटी हो गई हूँ".....  और वही प्रश्न उन्होंने दिव्या दी से भी पूछ डाला ...... इस पर दिव्या दी ने भी वही कहा जो मैं कहता हूँ बल्कि सब कहते है कि, "नहीं स्वप्निल ! आप मोटी नहीं लगती हो"...............................

अब इसके बाद लड़कियों का प्रपंच चालू हुआ ..... और मैं खुद को कोसने लगा कि आखिर क्यों मैंने स्वप्निल दी की बात मानी और यहाँ इन दो खूबसूरत बालाओं और बलाओं के बीच फँस गया .......


इसके बाद सबसे पहले मैंने इन दोनों की प्रपंच करते समय की कुछ फोटोस चुपचाप क्लिक की ..... गॉसिप्स में ये दोनों दोस्त इतना मशगूल थीं कि मैं इनकी फोटोस क्लिक कर रहा हूँ इसका आभास भी इन्हें नहीं हुआ और जब हुआ तो दोनों की दोनों चौंक गईं और फिर हँसने लगीं ...... मैंने फिर फैसला किया कि अब मैं भी "प्रपंच" करुँगा ...... इसके बाद हमनें मिलकर स्कूल डेस के समय की कुछ चटपटी बातें याद की..... इन दोनों की बातों में मैं, भी अपनी बहूमूल्य टिप्पणियाँ दे रहा था ...... उदाहरण के तौर पर, दिव्या दी और स्वप्निल दी हमारे विद्यालय में पढ़ने वाली एक लड़की की बात कर रही थीं .....जो दिव्या दी की दोस्त थी पर मुझे और स्वप्निल दी को बिल्कुल पसंद नहीं थी तो मैंने भी बीच में कहा कि कहीं आप लोग उसकी तो बात नहीं कर रहे जो खुद को कैटरीना कैफ बनती थीं.... मेरी इस बहूमूल्य बात पर दोनों ने सहमति जताई और हमेशा की तरह मैं, इस बार भी सही था.

उसके बात चाय आई..... हमारी प्यारी- दुलारी चाय अदरक व इलायची वाली चाय ....... चाय की चुसकियों के साथ प्रपंच पुन: चालू था और मेरी क्या हालत थी वो तो आप मेरी फोटोस को देख भली भाँति समझ सकते है़ ........ तो चलिये दोस्ती के इस अनलोल रिश्ते को जिन खूबसूरत तस्वीरों में हमने संजोया है , उन  फोटोस को आप भी देखिये और हमारी इस प्यारी सी व सुंदर सी दोस्ती व दुनिया का लुत्फ़ उठाइये. 



ये रही दो दोस्तों की प्रपंच व गॉसिप की कहानी ......... 9 साल पुरानी !!!!!!










स्वप्निल दी , दिव्या दी और उनकी मौसी जी .....मौसी जी सुंदरता के मामले में इन दोनों को ट्क्कर दे रही हैं .....किसी ने सही कहा है कि 'Beauty lies in simplicity '





ये देखिये इनकी पक्की वाली दोस्ती ..... यहाँ भी स्वप्निल दी को बीच बीच में उनके मोटापे की चिंता सता रही थी.






















एक सुंदर बालक 











फूलकुमारी .............










ये देखिये इन दोनों सहेलियों की इतनी सारी सुंदर- सुंदर फोटोस क्लिक करने के बाद मैंने इनसे कहा कि  मेरी भी एक फोटो तो क्लिक करो और मेरी फोटो क्लिक करने के बाद उनकी हालत नीचे की फ़ोटो मे देखिये तो जरा...... हद है ...किसी ने सही कहा है नेकी कर दरिया में डाल और किसी से अपेक्षा नहीं करनी चाहिये !!!!!!






ये देखिये दिव्या दी और स्वप्निल दी 9 सालों बाद एक दूसरे से मिल कर इतना प्रसन्न हो गईं कि प्रसन्नता के कारण ये दोनों हिल कर रह गईं जिसकी झलक इस फोटो में भी साफ दिखाई दे रही है .







दिव्या दी वाकई में बहुत सुंदर है...... वे मॉड्लिंग के क्षेत्र में तेजी से अग्रसर है .....मैं उनका भाई व सच्चा दोस्त होने के नाते उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ.








स्वप्निल दी के बालों को देख मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं...............






इस फोटो में मैं, पूरी ज़द्दोज़ेहद कर रहा हूँ कि फोटो में मेरी डिज़ाइनर दाढ़ी भी कैपचर हो जाए.





सच्चे दोस्तों में इतना ही विश्वास और भरोसा होना चाहिये कि एक दोस्त आँख बंद कर के भी दूसरे पर भरोसा कर सके और दूसरे दोस्त को भी उस भरोसे का मान रखना चाहिये ..... 





ये पोज़ मैंने बताया था जिसके पीछे का कारण साफ था कि दिव्या दी और स्वप्निल दी में  वैसे तो कभी लड़ाई हुई नहीं ...... अब असलियत में न सही तो Acting   ही सही ... पर दोनों के दोनों Over Acting  कर रहे हैं.





Presenting The Three Super Stars :































अब दिन ढल रहा था ..............9 सालों के बाद के ये चंद पल वाकई अनमोल हैं....... अब ये मुलाकात अपने अंतिम चरण पर आ पहुँची थी. दिव्या दी थोड़ा Senti हो रहीं थी ......... वे बार - बार कह रहीं थी कि, "कितनी जल्दी समय बीत गया .......... तुम लोग मत जाओ ना.... थोड़ी देर और बातें करते हैं"...... हमें भी उस वक़्त यही लग रहा था कि काश ! ये समय यहीं थम जाए ........ एक खूबसूरत मोड़ पर रुक जाए पर समय कब किसी के लिए रुका है ...... तो बस 9 सालों के बाद की इस मुलाकात का अंत भी हुआ कुछ खूबसूरत यादों के साथ ...... प्यारी प्यारी बातों के साथ ...... अदरक वाली चाय की प्याली के साथ ..... यारों की यारी के साथ ......
स्वप्निल दी, दिव्या दी और मेरी 'दोस्ती' को बयां करने के लिए शब्द कम पड़ रहें हैं.. पर हमारी इस दोस्ती को शायद ये चंद पंक्तियाँ आसानी से बयाँ कर पाएं :



तेरी दोस्ती में खुद को महफूज़ मानते हैं
हम दोस्तों में तुम्हें अज़ीज़ मानते हैं
तेरी दोस्ती के साये में ज़िंदा हैं
हम तो तुझे खुदा का दिया हुआ ताबीज़ मानते हैं............










इसी के साथ मैं, ऋषभ शुक्ल अपने ब्लॉग ऋषभ आर्टस के  अंतर्गत 'दोस्ती के नाम' नामक इस सेगमेंट को यही समाप्त कर रहा हूँ ..... उम्मीद है कि 'दोस्ती के नाम' की इन् 10 श्रृंखलाओं ने कहीं न कहीं आप सभी के हृदय को छुआ होगा. 


मुझे आज भी याद है जब मैंने 'दोस्ती के नाम' के प्रथम श्रृंखला को आप सभी के समक्ष प्रस्तुत किया था और तब से लेकर आज तक आप लोगों का ढेर सारा प्रेम मुझे प्राप्त हो रहा है .... 'दोस्ती के नाम' की इन दस श्रृंखलाओं में अपने कुछ खास दोस्तों से आप सभी को रुबरु कराया ...... कुछ श्रृंखलायें तो फेसबुक पर बने दोस्तों के नाम भी की ............. 'दोस्ती ' के शब्द को कितनी गहराई से आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर पाया हूँ इस पर तो आप पाठकों का निर्णय की सर्वोपरी रहता है.... अत: हमेशा की तरह इस बार भी  'दोस्ती के नाम' की दसवीं श्रृंखला में आप सभी से निवेदन करुँगा कि दिल खोल कर अपनी टिप्पणियाँ भेजियेगा .... मुझ पर अपने प्रेम की वर्षा करियेगा .... दोस्ती का ये रिश्ता आपके लिये क्या मायने रखता है इस पर भी अपनी राय व नज़रिये से मुझे  जरुर अवगत कराइयेगा. 


अंत में, 
दोस्ती के नाम ये 10 जाम .....
भूल कर भी  भूल न  पाएंगे हम  .......
क्योंकि जब दोस्ती की ही है हमने .........
तो दिल खोल के इसे निभाएंगे हम ........
जब तक है मेरी जान में जान .........
तब तक दिल में बस यही है अरमान  ...... 
कि मौत से पहले भी हमें नसीब हो पाए .......
दोस्ती के नाम एक प्यार भरा जाम......
          
 


आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :


                                                      - ऋषभ शुक्ल


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