गायन , वादन तथा नृ्त्य कला .





गायन , वादन  तथा  नृ्त्य  कला .

भारतीय संगीत में गायन , वादन तथा नृ्त्य के साथ ताल संबंधी वाद्यों का प्रयोग न जाने कब से होता चला आ रहा है . उपलब्ध प्राचीन संगीत के इतिहास में हमें ताल संबंधी वाद्यों का प्रयोग कहीं-कहीं मिलता है . 





पौराणिक कथाओं में अनेक ताल वाद्यों की चर्चा की गई है . प्राचीन काल के जिन ताल संबंधी वाद्यों का उल्लेख मिलता है , उनमें आघाती, आदम्बर , वानस्पति, भेरी , दुर्दुर , ढोल, नगाड़ा तथा मृ्दंग या पखावज आदि मुख्य हैं. पखावज का प्रयोग तो आज भी कभी कभी देखने को मिलता है और ढोलक का प्रयोग उत्तर भारत के लोक गीतों के साथ खूब किया जाता है . आधुनिक युग के ताल संबंधी वाद्यों में सबसे प्रमुख स्थान तबले को प्राप्त है . इसकी उत्पत्ति के विषय में विद्वानों में अनेक मत हैं . कुछ के अनुसार प्राचीन काल के दुर्दुर नामक वाद्य का आधुनिक रुप तबला है . कुछ लोग तबले के जन्म का संबंध फारस के वाद्य तब्ल से जोड़ते हैं . कुछ लोगों का कहना है कि पखावज को बीच से काटकर तबले को जन्म दिया गया . बहुत दिनों तक बादशाह अलाउद्दीन खिलजी के काल के अमीर खुसरो को तबला के जन्मदाता का श्रेय प्राप्त होता रहा है . परंतु बाद में खोज के बाद यह तथ्य गलत मालूम हुआ. डा. अरुण कुमार सेन के अनुसार मुहम्मद शाह { दूसरे } के समय सन 1734 में रहमान खाँ नामक एक प्रसिद्ध पखावजी थे , उनके पुत्र का नाम अमीर खुसरो था . इस अमीर खुसरों ने सदारंग से कुछ दिनों तक ख्याल गायन सीखा और उस गायन शैली की संगति के उपयुक्त तबला नामक वाद्य को जन्म दिया . एक विद्वान का मत है कि मुहम्मद शाह रंगीले के समय में निरमोल खाँ के पुत्र नियामत खाँ एक अच्छे संगीतज़ थे , उनका उपनाम सदारंग था और इनके एक छोटे भाई का नाम खुसरो खाँ था . इन्हीं खुसरो खाँ ने तबले का आविष्कार किया . मुहम्मद शाह रंगीले का राज्यकाल सन 1719  से 1748 ई. के आस- पास का था , अत: तबले का जन्म भी इसी काल में मानते हैं.



तबले का जन्म किसी भी प्रकार हुआ हो , किंतु इतना तो उपलब्ध इतिहास के अनुसार निश्चित है कि  उसके वादन को आधुनिक रुप देने का श्रेय दिल्ली के प्रसिद्ध उस्ताद सिद्धार खाँ अथवा सिधार खाँ को है , जिन्होंने पखावज के बोलों को तबले पर बजाने के योग्य बनाया तथा उसके रुप में सुधार लाकर आधुनिक तबले का रुप देकर इसका प्रचार किया और दिल्ली के प्रसिद्ध घराने ' दिल्ली घराने ' की नींव डाली . उन्हीं की वंश-परंपरा तथा शिष्य- परंपरा ने भारत में तबले का प्रचार किया और वर्तमान घरानों की नींव डाली .

मैंने तबला वादन में अपनी विधिवत  पाँच वर्षीय शिक्षा इलाहाबाद के प्रख्यात 'प्रयाग संगीत समिति ' से पूर्ण की . तबला वादन में मुझे हमेशा से ही विशेष रुचि रही है . तबला वादन व संगीत मुझे हर वक़्त सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है . कहा जाता है की संगीत धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की प्राप्ति का अद्वितीय साधन है . संगीत का इतिहास एक ऐसा इतिहास है , जिसमें मनव का संपूर्ण रुप प्रतिबिम्बित होता है .





 

 आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :

                                                      - ऋषभ शुक्ल

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Comments

  1. भानु सिंह21 February 2013 at 04:16

    वाह ऋषभ जी ! तो तबला वादन की कला में भी आप महारथी हैं . अचंभित हूँ कि आज के वर्तमान समय की युवा पीढ़ी भी शास्त्रीय संगीत में रुचि रखती है . आप नि: संदेह युवाओं के लिये प्रेरणा हैं. बधाई.

    - भानु सिंह , इलाहाबाद

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  2. बढ़िया लेख . आभार तबले के इतिहास से हमें रुबरु कराने के लिये
    * मनीषा वर्मा

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  3. विपुल अवस्थी21 February 2013 at 04:19

    अब समझ में आ रहा है कि आपने अपने इस चिट्ठे का नाम क्यों रखा . और कितनी कलाओं का समावेश है आपके भीतर ऋषभ .आपके व्यक्तित्व के कितने और रंगों से हमारा साक्षात्कार होना बाकी है ? " तबला वादन में विधिवत पाँच वर्षीय शिक्षा " - सुन कर ही बड़ा डरावना अहसास होता है क्योंकि शास्त्रीय संगीत बेहद जटिल विषय है और उसमें 5 वर्षीय शिक्षा कोई छोटी बात नहीं . आपको नमन !

    - विपुल अवस्थी

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  4. डा. अबिनाश श्रीवास्तव21 February 2013 at 04:20


    "तबला वादन में पाँच वर्षीय शिक्षा "................... बाप रे बाप . आपको तो तबले के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाना चाहिये था . अब आगे क्या प्रभाकर , प्रवीण और विशारद करने के बारे में क्या विचार हैं आपके . आक के युग में शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में आप जैसे युवा ही क्रांति ला सकते हैं . मेरी बात पर गौर फर्माइयेगा ऋषभ . बधाई.
    - डा. अबिनाश श्रीवास्तव

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  5. विनोद तिवारी21 February 2013 at 04:22

    आप तो बड़े छुपे रुस्तम हैं . अभी हम आपके चित्रकारी , आलेखन व लेखन कला से ही परिचित हो पाए थी कि अब संगीत व तबला वादन की कला के भी आप उस्ताद निकले . इतना सब मैनेज कैसे कर पाते हैं आप . शुभकामनाये ऋषभ जी .
    - विनोद तिवारी, लखनऊ.

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  6. a very nice and well written blog ......... nice portrait .

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  7. bahut khoob . badhiya lekh

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  8. great and very rare info on the history of tabla
    thanks mr. rishabh for sharing this . and very nice presentation

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  9. bahut khoob rishabh ji ..nice painting with nice article !

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