दोस्ती के नाम : 07




दोस्ती के नाम :  07

'दोस्ती के नाम' की सातवीं श्रृंखला के साथ मैं, आप सभी के समक्ष एक बार पुन: उपस्थित हूँ. कुछ लोग वर्तमान का आनंद प्राप्त करते हैं और भूतकाल को विस्मृ्त कर देते हैं. वे उसी तक सीमित रहते हैं जिससे वे जुड़े होते हैं .... जिस पर उनकी नज़र नहीं पड़ती , उसे वे खोया हुआ मान लेते हैं....... लेकिन दूसरे इसमें ठोस आनंद का अनुभव करते हैं ....जीवन छोटा है . सच्ची दोस्ती के उदाहरण  प्रस्तुत करना एक अत्यंत कठिन कार्य  है लेकिन मैं , इस बात को उचित मानना हूँ कि वे दोस्त जो कभी न कभी आप के सच्चे  दोस्त थे या हैं , उनके नाम के प्रति व उनके प्रति स्मृ्ति बनाई रखी जाए.  क्योंकि दोस्ती की खट्टी - मीठी यादे .... पुरानी बाते हमारे वर्तमान को आनंददायक बनाती हैं ..खासकर तब जब हम कुछ खास क्षणों में उनका स्मरण करते हैं . उन लोगों को याद करना निश्चित रुप से आनंददायक होता है जो आपके हृ्दय के करीब है .....जो आपके लिए खास हैं.

आज स्मृ्तियों के बक्से का ताला खोल ' दोस्ती के नाम ' की इस कड़ी में आप सबका साक्षात्कार कराने जा रहा हूँ अपने प्यारे दोस्ते -' श्री अंकित दुआ ' जी से .





अंकित से मेरी मुलाकात 11वीं कक्षा , वाणिज्य संकाय में हुई  .... उसने कक्षा के नए सत्र में थोड़ी देर से दाखिला लिया था . उस वक़्त  मैं , कक्षा का मॉनिटर था ..... एक सख़्त व खड़ूस मॉनिटर ........ कक्षा के पहले दिन अंकित सिविल ड्रेस में आया था . कक्षा का मॉनिटर होने के नाते मैं, विद्यालय की प्रात: सभा के दौरान यह सुनिश्चित करता था कि सभी छात्र पूर्णतया स्कूल ड्रेस में और विद्यालय के अनुशासन के मापदंडों में खरे उतर कर ही विद्यालय की प्रात: सभा में आए हैं या नहीं.... उदाहरण बाल बड़े नहीं होने चाहिये , शर्ट की बाँहे फोल्ड न की गईं हों , बेल्ट पहनी हों , नाखून बड़े न हों, जूते पॉलिश हों , कपड़े इस्तरी करे हुए हों.... आदि  हमारे विद्यालय में खुद हो अनुशासित बच्चा सिद्ध करने के कुछ मापदंड थे .

अब अंकित का तो विद्यालय में पहला दिन ही था और वो सिविल ड्रेस में था ........ सभी जानते थे कि मैं अनुशासन के मामले में कितना सख़्त था .... फिर Duty    के समय No दोस्ती  No यारी ....... पर चूंकि अंकित का हमारे विद्यालय में पहला दिन था तो मैंने उसे कुछ नहीं कहा और हमारे विद्यालय के सभी Rules & Regulations समझा दिये ...... अंकित ने भी एक अच्छे बच्चे की तरह सारे Rules & Regulations  समझ लिये.... वहाँ से हमारी दोस्ती की शुरुआत हुई. देखते ही देखते अंकित और मेरी दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि वो मेरे शीर्ष दोस्तों की श्रेणी में आ गया . 

11वीं कक्षा  में अंकित मेरे साथ ही बैठता था. उस वक़्त अंकित काफी मांसल था , एकदम Teddy Bear जैसा . तो हम लोग उसको चिढ़ाया करते थे और वो चिढ़ भी जाता था .......  मैं तो अंकित को किसी भी Period में पढ़ने ही नहीं देता था और ऐसी स्थिति में वो अक्सर मुझसे बड़े ही  खीजते हुए कहता था कि, " ऋषभ ! तुम्हें तो कुछ पढ़ना नहीं लेकिन मुझे तो कृ्पा कर के पढ़ने दो .... पढ़ो और पढ़ने दो !"......लेकिन अंकित कभी भी किसी भी बात को दिल से नहीं लगाता था.. अंकित काफी सहयोगी और खुशमिजाज़ किस्म का युवक था ......

एक बार हमारे वाणिज्य विषय के शिक्षक द्वारा हमारी कक्षा की सीटिंग व्यवस्था में  भीषण बदलाव किये गए...... कुछ ऐसी व्यवस्था की गई जिससे सभी विद्यार्थियों के बने बनाये Groups टूट जाए जिससे उनका पढ़ने में अधिक मन लगे ...... इसके पीछे क्या Logic था , मुझे आज दिन तक समझ नहीं आया . खैर, अंकित मेरे बगल की सीट में बैठता था और अब नई सीटिंग व्यवस्था के परिणामस्वरुप अंकित  की जगह मेरे साथ मेरी कक्षा का अन्य साथी बैठ गया और अंकित उसके स्थान पर चला गया....... इससे मुझे कोई खास आपत्ति नहीं हुई  ...... हाँ बुरा जरुर लगा कि एक तो बड़ी की मुश्किल से आज के जमाने में  कुछ अच्छे दोस्त मिलते हैं और उसमें भी रोज- रोज के नए- नए नियम व फालतु के परिवर्तन सिर्फ समय की बर्बादी ही लगती थी और होती भी थी  पर ये बाते हमारे महा -परा- महा आदरणीय वाणिज्य विषय के वाणिज्य Minded सर जी को  कौन समझाता. लेकिन अंकित ने तुरंत जाकर इस बात का विरोध किया और हमारे सर से { जिनसे अमूमन किसी भी विद्यार्थी की बात करने की हिम्मत नहीं होती थी , मेरे अलावा } साफ- साफ कह दिया कि सर 'ऋषभ' मेरा सबसे अच्छा दोस्त है और मैं उसके साथ ही बैठूंगा ...... और उसके दृ्ड़ निश्चय के सामने सर जी को पुन:  सीटिंग व्यवस्था बदलनी पड़ी और अंकित फिर से मेरे साथ बैठने लगा .

अंकित का वो बालहठ व दृ्ढ़ निश्चय काफी प्रशंसनीय था...... उसके स्वभाव में मासूमियत थी, सरलता थी , भोलापन था.......चालाकी , छल- कपट , कुटिलता से कोसो दूर 'अंकित ' सही अर्थ में एक सच्चा दोस्त था .
स्कूल डे़स के अंत के बाद अंकित से मेरी कोई मुलाकात नहीं हुई . हालांकि Facebook के माध्यम से हम आज भी संपर्क में हैं...... एक अच्छे दोस्त की भाँति अंकित मेरे हर कार्य का प्रशंसक है ..... उसको कला की इज्जत है .....  हमारे प्रिय मित्र श्री अंकित दुआ जी हैं भी काफी शौकीन मिजाज़ ...... ऐसे में जब उसने मुझसे अपना Portrait बनवाने की तीव्र इच्छा जाहिर की तो मैं मना नहीं कर पाया . अंकित ने मुझसे  साफ - साफ कह दिया था कि, " ऋषभ ! अगर मैं कभी अपना Portrait बनवाऊँगा तो सिर्फ और सिर्फ तुमसे { अर्थात मुझसे अर्थात ऋषभ शुक्ल से } ही बनवाऊँगा . ऐसी स्थिति में मैं, कैसे अपने प्यारे दोस्त को न कहता.







अब तक तो वे सभी कलाप्रेमी व साहित्य प्रेमी जो मेरे ब्लॉग्स से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से जुड़े हुए हैं , उन्हें पता ही चल गया होगा कि ' दोस्ती के नाम ' की श्रृंखलाओं में मैं, उन्हीं को शामिल करता हूँ जो वास्तविकता में 'दोस्ती के नाम' के हकदार हैं .....  इसलिये इस श्रृंखला में बार - बार इस बात को लिखना नहीं भूलता कि 'दोस्ती के नाम' सिर्फ मेरे सच्चे दोस्तों को ही समर्पित है या उन लोगों को जो मेरी दृ्ष्टि में खास हैं और 'अंकित' की दोस्ती बिना किसी संदेह के मेरे लिये अनमोल है व बेहद खास है . अंत में अपने दोस्त 'अंकित' से यही कहूँगा कि -

ऎ दोस्त !
दुआ दे रहा हूँ तुझको,
अपने दिल से,
प्रकाशवान रहे सूरज तेरा,
मिटाते रहो तुम अंधेरा .
भविष्य हो रौशन ,
जीवन हो उज्जवल,
न रहे तुझे कोई दुख व पीड़ा.
प्रकाशवान रहे सूरज तेरा,
मिटाते रहो तुम अंधेरा .
बस इतनी सी मेरी बात ,
हमेशा तुम याद रखना ,
ऐसे लोगों से दोस्ती,
तुम कभी ना करना ,
जो देते हैं पहले खुशी,
और बाद में दुख और अंधेरा.
गुलाब का फूल लेते वक़्त ,
काँटों से जरा सावधान रहना .
और इस प्रकार की सतर्कता के लिये,
मेरा यह ब्लॉग सदैव तुम पढ़ते रहना,
और थोड़ी बहुत तारीफे भी कर देना,
भले ही इस ब्लॉग पर न सही तो
Facebook Message द्वारा ही तारीफे कर देना,
और यदि तारीफे न  करी तो
इस ब्लॉग के Delete होने का
इंतजार कर लेना !!!!!!!!!!
{ 'हा हा हा हा हा  मज़ाक कर रहा हूँ '
आखिर की पंक्तियों को Seriously मत ले लेना }  :P







आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :


                                              - ऋषभ शुक्ल


copyright©2012-Present Rishabh Shukla.All rights reserved
No part of this publication may be reproduced , stored in a  retrieval system or transmitted , in any form or by any means, electronic, mechanical, photocopying, recording or otherwise, without the prior permission of the copyright owner. 
 

Copyright infringement is never intended, if I published some of your work, and you feel I didn't credited properly, or you want me to remove it, please let me know and I'll do it immediately.

Comments

  1. अनुज बाजपई15 February 2013 at 06:24

    वाह ऋष्भ जी ! वाह क्या खूब .
    बधाई

    - अनुज बाजपई

    ReplyDelete
  2. Dosti ke naam series are "JUST FANTASTIC "..

    - Gaurav Singh

    ReplyDelete
  3. wow. Great blog . very well written with good & healthy humour
    Good work sir !


    Shilpi Saxena

    ReplyDelete
  4. Rishabh ji ,

    your life & friendship experiences are really amazing . and your way of revealing the incidents is incredible .
    Best of luck for your writing , designing & artistic career .

    Regards,
    Mohan Agnihotri

    ReplyDelete
  5. डा. बिमल श्रीवास्तव15 February 2013 at 06:29


    प्रिय ऋषभ जी !

    हम उत्तर प्रदेश की एक हिन्दी मासिक पत्रिका के संपादक हैं. आपका ब्लॉग पढा . भाषा पर सटीक पकड़ है आपको . लेख बेहद मनोरंजक हैं व खूबसूरती से लिखे गए हैं. यदि आपकी अनुमति हो तो हम आपके लेखों को खासकर 'दोस्ती के नाम ' की अभी तक की श्रृंखलाओं को अपनी पत्रिका में प्रकाशित करना चाहते हैं . एक अलग स्तंभ के रुप में . यदि आप भी इच्छुक हों तो कृ्प्या प्रति लेख के लिये अपने मेहनताना बताने का कष्ट करें . हमारी पत्रिका की अन्य जानकारी मैंने आपको मेल कर दी है .

    आभार

    - डा. बिमल श्रीवास्तव

    ReplyDelete
  6. long live Rishabh arts ..long live dosti ke naam !

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

Queen of Hearts : Divya Bharti

गायन , वादन तथा नृ्त्य कला .

Angel of Silver Screen, the Venus Queen : Madhubala