Thursday, 21 February 2013

गायन , वादन तथा नृ्त्य कला .





गायन , वादन  तथा  नृ्त्य  कला .

भारतीय संगीत में गायन , वादन तथा नृ्त्य के साथ ताल संबंधी वाद्यों का प्रयोग न जाने कब से होता चला आ रहा है . उपलब्ध प्राचीन संगीत के इतिहास में हमें ताल संबंधी वाद्यों का प्रयोग कहीं-कहीं मिलता है . 





पौराणिक कथाओं में अनेक ताल वाद्यों की चर्चा की गई है . प्राचीन काल के जिन ताल संबंधी वाद्यों का उल्लेख मिलता है , उनमें आघाती, आदम्बर , वानस्पति, भेरी , दुर्दुर , ढोल, नगाड़ा तथा मृ्दंग या पखावज आदि मुख्य हैं. पखावज का प्रयोग तो आज भी कभी कभी देखने को मिलता है और ढोलक का प्रयोग उत्तर भारत के लोक गीतों के साथ खूब किया जाता है . आधुनिक युग के ताल संबंधी वाद्यों में सबसे प्रमुख स्थान तबले को प्राप्त है . इसकी उत्पत्ति के विषय में विद्वानों में अनेक मत हैं . कुछ के अनुसार प्राचीन काल के दुर्दुर नामक वाद्य का आधुनिक रुप तबला है . कुछ लोग तबले के जन्म का संबंध फारस के वाद्य तब्ल से जोड़ते हैं . कुछ लोगों का कहना है कि पखावज को बीच से काटकर तबले को जन्म दिया गया . बहुत दिनों तक बादशाह अलाउद्दीन खिलजी के काल के अमीर खुसरो को तबला के जन्मदाता का श्रेय प्राप्त होता रहा है . परंतु बाद में खोज के बाद यह तथ्य गलत मालूम हुआ. डा. अरुण कुमार सेन के अनुसार मुहम्मद शाह { दूसरे } के समय सन 1734 में रहमान खाँ नामक एक प्रसिद्ध पखावजी थे , उनके पुत्र का नाम अमीर खुसरो था . इस अमीर खुसरों ने सदारंग से कुछ दिनों तक ख्याल गायन सीखा और उस गायन शैली की संगति के उपयुक्त तबला नामक वाद्य को जन्म दिया . एक विद्वान का मत है कि मुहम्मद शाह रंगीले के समय में निरमोल खाँ के पुत्र नियामत खाँ एक अच्छे संगीतज़ थे , उनका उपनाम सदारंग था और इनके एक छोटे भाई का नाम खुसरो खाँ था . इन्हीं खुसरो खाँ ने तबले का आविष्कार किया . मुहम्मद शाह रंगीले का राज्यकाल सन 1719  से 1748 ई. के आस- पास का था , अत: तबले का जन्म भी इसी काल में मानते हैं.



तबले का जन्म किसी भी प्रकार हुआ हो , किंतु इतना तो उपलब्ध इतिहास के अनुसार निश्चित है कि  उसके वादन को आधुनिक रुप देने का श्रेय दिल्ली के प्रसिद्ध उस्ताद सिद्धार खाँ अथवा सिधार खाँ को है , जिन्होंने पखावज के बोलों को तबले पर बजाने के योग्य बनाया तथा उसके रुप में सुधार लाकर आधुनिक तबले का रुप देकर इसका प्रचार किया और दिल्ली के प्रसिद्ध घराने ' दिल्ली घराने ' की नींव डाली . उन्हीं की वंश-परंपरा तथा शिष्य- परंपरा ने भारत में तबले का प्रचार किया और वर्तमान घरानों की नींव डाली .

मैंने तबला वादन में अपनी विधिवत  पाँच वर्षीय शिक्षा इलाहाबाद के प्रख्यात 'प्रयाग संगीत समिति ' से पूर्ण की . तबला वादन में मुझे हमेशा से ही विशेष रुचि रही है . तबला वादन व संगीत मुझे हर वक़्त सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है . कहा जाता है की संगीत धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की प्राप्ति का अद्वितीय साधन है . संगीत का इतिहास एक ऐसा इतिहास है , जिसमें मनव का संपूर्ण रुप प्रतिबिम्बित होता है .





 

 आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :

                                                      - ऋषभ शुक्ल

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Monday, 18 February 2013

Kama Sutra Inspirations - 1



Kama Sutra  Inspirations - 1

Love & Lust

Kama Sutra is an ancient Indian hindu text widely considered to be the standard work on human sexual behaviour in sanskrit literature written by Vatsyayana . A portion of the work consisits of practical advice on sexual intercourse .

Kama  which is one of the three goals of hindu life means sensual or sexual pleasure and ' Sutra ' literally means a thread or line that holds things together  and more metaphorically refers to an aphorism { or line, rule , formula } or a collection of such aphorisms in the form of a manual .

Some Indian philosophies  follow the four main goals of  life known as Purusharthas.

1- Dharma :   virtous living
2- Artha : Material prosperity
3- Kama : Aesthetic and erotic pleasure
4- Moksha : Liberation


Dharma , artha & kama are aims of everyday life while Moksha is a release from the cycle of death and rebirth .

In childhood, Vatsyayana says, a person should learn howw to make a living ; youth is the time for pleasure , and as years pass one should concentrate on living virtuously and hope to escape the cycle of rebirth .

Vatsyayana 's Kama Sutra has 1250 verses distributed in 36 chapters which are further organized  into 7 parts .

The contents of the book are structured into 7 parts like the following :

1- General remarks

05 chapters on contents of the book , three aims & priorities of life and the acquisitions of knowledge conduct of the well -bred - townsman , reflections on intermediaries  who assist the lover in his  enterprises.

2- Amorous advances / sexual union 

10 chapters on stimulation of desire , types of embraces , caressing and kisses   , marking with nails, biting and marking with teeth , on copulation { positions } , slapping by hand and corresponding moaning, virile behaviour in women , superior coition and oral sex , preludes and conclusions to the game of love . It describes 64 types of sexual acts .

3- Acquiring a wife 

05 chapters on form of marriage, relaxing the girl, obtaining the girl , managing alone , union by marriage .

4- Duties & privileges of the wife 

02 chapters on condust of the only wife and conduct of the chief wife and other wives

5- Other men's wives

06 chapters on behaviour of woman and man , how to get acquainted, examination of sentiments , the task of go- between , the king's pleasures, behaviour in the women's quarters.

6- About courtesans

06 chapters on advice of the assistants on the choice of lovers , looking for a steady lover, ways of making money, renewing friendship with a former lover, occassional profits, profits & losses.

7- Occult practices 

02 chapters on improving physical attractions , arousing a weakened sexual power .



Well, that's the basic info. about Kama Sutra . It is truly amazing to think that ‘publicly and officially’ we are not people who talk about sex openly. India and the Kamasutra go back a long way. Yet somehow we still talk about sex like it’s a bad word. That's  the reality of our society.

I made some paintings inspired by Kama Sutra ' Love & Lust ' just for the purpose of understanding the true meaning of love as well as lust . I am sure all the readers will enjoy these paintings of Love & Lust .
& Yes I know, you won’t comment here. Write in to me with your response @  shuklarishabh52@gmail.com
I look forward to it (with giggle ).

Enjoy the feeling of Love & Lust via these mesmeriz ing paintings ...................................



















- Rishabh Shukla


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Friday, 15 February 2013

दोस्ती के नाम : 08



दोस्ती के नाम :  08

' दोस्ती के नाम ' की आठवीं  श्रृंखला में आप सभी का हार्दिक स्वागत है. आज यह चिट्ठा समर्पित कर रहा हूँ अपने प्रिय मित्र 'श्री पंकज उपाध्याय ' जी  को. 'दोस्ती के नाम' की इस कड़ी को लिखते हुए मन एक बार फिर आनंद से भर उठा है . आज जिस शख्सियत से आप सभी को रुबरु कराने  जा रहा हूँ वे हैं - श्री पंकज  उपाध्याय जी.  


कानपुर विश्वविद्यालय से Biochemistry  में स्नातक व एम. बी. ए , 'पंकज' एक सफल उद्योगी हैं. 


 श्वेत वर्ण , गंभीर व्यक्तित्व , सुडौल व गठीले शरीर वाले व विनम्र स्वभाव के पंकज उपाध्याय जी के Portraits को अपने ब्लॉग ' Rishabh Arts ' पर जगह देकर बड़ी ही प्रसन्नता हो रही है . पंकज जी के Portraits  बनाने के पीछे कारण सिर्फ उनकी ही मर्जी नहीं अपितु उनके भाई 'श्री दीपक शुक्ल ' ने जब मुझसे उनके Portrait  बनाने की बात कही तो मैं , मना नहीं कर पाया . असल में दीपक इन Portraits को अपने भाई के समक्ष एक Surprise के तौर पर प्रस्तुत करना चाहता था . समय के अभाव के कारण काफी समय बीत गया पर दीपक की इस इच्छा को पूर्ण न कर पाने का अफसोस निरंतर मुझे हो रहा था . अभी कुछ समय पूर्व थोड़ी फुरसत मिली तो सोचा क्यों न इस कार्य को भी अंजाम दे ही देता हूँ....... और यहाँ तो कला के जरिये व इन Portraits के जरिये  एक ऐसी कहानी तैयार हो गई है जो काफी वर्षों तक इन दो भाईयों  { पंकज और दीपक }  के चेहरे पर मुस्कान बिखेरती रहेगी ...... और मुझे कभी किन्हीं विशेष  क्षणों में इस कहानी को याद कर खुश होने की वजह मिल जाएगी क्योंकि पंकज जी के इन खूबसूरत Portraits को आखिर बनाया तो मैंने ही है .

पंकज और दीपक , इन दोनों भाईयों के बीच परस्पर सम्मान व प्रेम  बना रहे और ये दोनों मुझे और मेरे ब्लॉग्स को सदैव याद रखें और भविष्य  में अपने बच्चों को भी मेरे इस ब्लॉग के दर्शन अवश्य करायें...... इस उम्मीद और विश्वास के साथ मैं, आपका प्यारा 'ऋषभ'  अपनी कलम { की- पैड } को यहीं विराम देता हूँ तब तक जब तक अन्य दोस्त 'दोस्ती के नाम' एक जाम लेने के लिये मुझे मजबूर ना कर दें. तब तक आप सभी अपना ख्याल रखियेगा , मेरे सभी ब्लॉग्स को हमेशा याद रखियेगा , मुझ पर विश्वास रखियेगा और अपने - अपने घर वालों को मेरा नमस्कार कहियेगा .

श्री पंकज उपाध्याय व श्री दीपक शुक्ल के उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ प्रस्तुत हैं पंकज जी के चित्र -


 











आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :


                                                      - ऋषभ शुक्ल

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दोस्ती के नाम : 07




दोस्ती के नाम :  07

'दोस्ती के नाम' की सातवीं श्रृंखला के साथ मैं, आप सभी के समक्ष एक बार पुन: उपस्थित हूँ. कुछ लोग वर्तमान का आनंद प्राप्त करते हैं और भूतकाल को विस्मृ्त कर देते हैं. वे उसी तक सीमित रहते हैं जिससे वे जुड़े होते हैं .... जिस पर उनकी नज़र नहीं पड़ती , उसे वे खोया हुआ मान लेते हैं....... लेकिन दूसरे इसमें ठोस आनंद का अनुभव करते हैं ....जीवन छोटा है . सच्ची दोस्ती के उदाहरण  प्रस्तुत करना एक अत्यंत कठिन कार्य  है लेकिन मैं , इस बात को उचित मानना हूँ कि वे दोस्त जो कभी न कभी आप के सच्चे  दोस्त थे या हैं , उनके नाम के प्रति व उनके प्रति स्मृ्ति बनाई रखी जाए.  क्योंकि दोस्ती की खट्टी - मीठी यादे .... पुरानी बाते हमारे वर्तमान को आनंददायक बनाती हैं ..खासकर तब जब हम कुछ खास क्षणों में उनका स्मरण करते हैं . उन लोगों को याद करना निश्चित रुप से आनंददायक होता है जो आपके हृ्दय के करीब है .....जो आपके लिए खास हैं.

आज स्मृ्तियों के बक्से का ताला खोल ' दोस्ती के नाम ' की इस कड़ी में आप सबका साक्षात्कार कराने जा रहा हूँ अपने प्यारे दोस्ते -' श्री अंकित दुआ ' जी से .





अंकित से मेरी मुलाकात 11वीं कक्षा , वाणिज्य संकाय में हुई  .... उसने कक्षा के नए सत्र में थोड़ी देर से दाखिला लिया था . उस वक़्त  मैं , कक्षा का मॉनिटर था ..... एक सख़्त व खड़ूस मॉनिटर ........ कक्षा के पहले दिन अंकित सिविल ड्रेस में आया था . कक्षा का मॉनिटर होने के नाते मैं, विद्यालय की प्रात: सभा के दौरान यह सुनिश्चित करता था कि सभी छात्र पूर्णतया स्कूल ड्रेस में और विद्यालय के अनुशासन के मापदंडों में खरे उतर कर ही विद्यालय की प्रात: सभा में आए हैं या नहीं.... उदाहरण बाल बड़े नहीं होने चाहिये , शर्ट की बाँहे फोल्ड न की गईं हों , बेल्ट पहनी हों , नाखून बड़े न हों, जूते पॉलिश हों , कपड़े इस्तरी करे हुए हों.... आदि  हमारे विद्यालय में खुद हो अनुशासित बच्चा सिद्ध करने के कुछ मापदंड थे .

अब अंकित का तो विद्यालय में पहला दिन ही था और वो सिविल ड्रेस में था ........ सभी जानते थे कि मैं अनुशासन के मामले में कितना सख़्त था .... फिर Duty    के समय No दोस्ती  No यारी ....... पर चूंकि अंकित का हमारे विद्यालय में पहला दिन था तो मैंने उसे कुछ नहीं कहा और हमारे विद्यालय के सभी Rules & Regulations समझा दिये ...... अंकित ने भी एक अच्छे बच्चे की तरह सारे Rules & Regulations  समझ लिये.... वहाँ से हमारी दोस्ती की शुरुआत हुई. देखते ही देखते अंकित और मेरी दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि वो मेरे शीर्ष दोस्तों की श्रेणी में आ गया . 

11वीं कक्षा  में अंकित मेरे साथ ही बैठता था. उस वक़्त अंकित काफी मांसल था , एकदम Teddy Bear जैसा . तो हम लोग उसको चिढ़ाया करते थे और वो चिढ़ भी जाता था .......  मैं तो अंकित को किसी भी Period में पढ़ने ही नहीं देता था और ऐसी स्थिति में वो अक्सर मुझसे बड़े ही  खीजते हुए कहता था कि, " ऋषभ ! तुम्हें तो कुछ पढ़ना नहीं लेकिन मुझे तो कृ्पा कर के पढ़ने दो .... पढ़ो और पढ़ने दो !"......लेकिन अंकित कभी भी किसी भी बात को दिल से नहीं लगाता था.. अंकित काफी सहयोगी और खुशमिजाज़ किस्म का युवक था ......

एक बार हमारे वाणिज्य विषय के शिक्षक द्वारा हमारी कक्षा की सीटिंग व्यवस्था में  भीषण बदलाव किये गए...... कुछ ऐसी व्यवस्था की गई जिससे सभी विद्यार्थियों के बने बनाये Groups टूट जाए जिससे उनका पढ़ने में अधिक मन लगे ...... इसके पीछे क्या Logic था , मुझे आज दिन तक समझ नहीं आया . खैर, अंकित मेरे बगल की सीट में बैठता था और अब नई सीटिंग व्यवस्था के परिणामस्वरुप अंकित  की जगह मेरे साथ मेरी कक्षा का अन्य साथी बैठ गया और अंकित उसके स्थान पर चला गया....... इससे मुझे कोई खास आपत्ति नहीं हुई  ...... हाँ बुरा जरुर लगा कि एक तो बड़ी की मुश्किल से आज के जमाने में  कुछ अच्छे दोस्त मिलते हैं और उसमें भी रोज- रोज के नए- नए नियम व फालतु के परिवर्तन सिर्फ समय की बर्बादी ही लगती थी और होती भी थी  पर ये बाते हमारे महा -परा- महा आदरणीय वाणिज्य विषय के वाणिज्य Minded सर जी को  कौन समझाता. लेकिन अंकित ने तुरंत जाकर इस बात का विरोध किया और हमारे सर से { जिनसे अमूमन किसी भी विद्यार्थी की बात करने की हिम्मत नहीं होती थी , मेरे अलावा } साफ- साफ कह दिया कि सर 'ऋषभ' मेरा सबसे अच्छा दोस्त है और मैं उसके साथ ही बैठूंगा ...... और उसके दृ्ड़ निश्चय के सामने सर जी को पुन:  सीटिंग व्यवस्था बदलनी पड़ी और अंकित फिर से मेरे साथ बैठने लगा .

अंकित का वो बालहठ व दृ्ढ़ निश्चय काफी प्रशंसनीय था...... उसके स्वभाव में मासूमियत थी, सरलता थी , भोलापन था.......चालाकी , छल- कपट , कुटिलता से कोसो दूर 'अंकित ' सही अर्थ में एक सच्चा दोस्त था .
स्कूल डे़स के अंत के बाद अंकित से मेरी कोई मुलाकात नहीं हुई . हालांकि Facebook के माध्यम से हम आज भी संपर्क में हैं...... एक अच्छे दोस्त की भाँति अंकित मेरे हर कार्य का प्रशंसक है ..... उसको कला की इज्जत है .....  हमारे प्रिय मित्र श्री अंकित दुआ जी हैं भी काफी शौकीन मिजाज़ ...... ऐसे में जब उसने मुझसे अपना Portrait बनवाने की तीव्र इच्छा जाहिर की तो मैं मना नहीं कर पाया . अंकित ने मुझसे  साफ - साफ कह दिया था कि, " ऋषभ ! अगर मैं कभी अपना Portrait बनवाऊँगा तो सिर्फ और सिर्फ तुमसे { अर्थात मुझसे अर्थात ऋषभ शुक्ल से } ही बनवाऊँगा . ऐसी स्थिति में मैं, कैसे अपने प्यारे दोस्त को न कहता.







अब तक तो वे सभी कलाप्रेमी व साहित्य प्रेमी जो मेरे ब्लॉग्स से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से जुड़े हुए हैं , उन्हें पता ही चल गया होगा कि ' दोस्ती के नाम ' की श्रृंखलाओं में मैं, उन्हीं को शामिल करता हूँ जो वास्तविकता में 'दोस्ती के नाम' के हकदार हैं .....  इसलिये इस श्रृंखला में बार - बार इस बात को लिखना नहीं भूलता कि 'दोस्ती के नाम' सिर्फ मेरे सच्चे दोस्तों को ही समर्पित है या उन लोगों को जो मेरी दृ्ष्टि में खास हैं और 'अंकित' की दोस्ती बिना किसी संदेह के मेरे लिये अनमोल है व बेहद खास है . अंत में अपने दोस्त 'अंकित' से यही कहूँगा कि -

ऎ दोस्त !
दुआ दे रहा हूँ तुझको,
अपने दिल से,
प्रकाशवान रहे सूरज तेरा,
मिटाते रहो तुम अंधेरा .
भविष्य हो रौशन ,
जीवन हो उज्जवल,
न रहे तुझे कोई दुख व पीड़ा.
प्रकाशवान रहे सूरज तेरा,
मिटाते रहो तुम अंधेरा .
बस इतनी सी मेरी बात ,
हमेशा तुम याद रखना ,
ऐसे लोगों से दोस्ती,
तुम कभी ना करना ,
जो देते हैं पहले खुशी,
और बाद में दुख और अंधेरा.
गुलाब का फूल लेते वक़्त ,
काँटों से जरा सावधान रहना .
और इस प्रकार की सतर्कता के लिये,
मेरा यह ब्लॉग सदैव तुम पढ़ते रहना,
और थोड़ी बहुत तारीफे भी कर देना,
भले ही इस ब्लॉग पर न सही तो
Facebook Message द्वारा ही तारीफे कर देना,
और यदि तारीफे न  करी तो
इस ब्लॉग के Delete होने का
इंतजार कर लेना !!!!!!!!!!
{ 'हा हा हा हा हा  मज़ाक कर रहा हूँ '
आखिर की पंक्तियों को Seriously मत ले लेना }  :P







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                                              - ऋषभ शुक्ल


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Friday, 8 February 2013

Queen of Hearts : Divya Bharti

Bollywood Inspirations : Divya Bharti 





Queen of Hearts  : Divya Bharti


Divya Bharti (25 February 1974 – 5 April 1993) was an Indian film actress, whose acting variety hailed her as "the most interesting young actress of her generation" starring in a number of commercially successful Hindi, Telugu and Tamil films in the early 1990s. Bharti played a variety of character types; her film roles along with her screen persona contributed to a change in the concept of a Hindi film heroine.

After spending much of her childhood in Tapri, Bharti began a career as an actress in Telugu films with the 1990 Telugu film Bobbili Raja. Her early film appearances had her play little more than love interest of the leading actors, but she drew attention when she progressed to Hindi films of Bollywood in 1992 with Vishwatma. Bharti went onto have commercial success with films like Shola Aur Shabnam and Deewana that same year for which she garnered a Filmfare Award for Best Female Debut. Bharti had acted in over 14 Hindi films between 1992 and 1993. Throughout her brief career, she often played strong female characters and, apart from mainstream cinema. Though her career went through certain periods of decline, she reinvented herself numerous times and was credited for her ability to sustain her status. The final years of Bharti's life were marked by personal problems, and a reputation for unreliability and difficulty to work with.

Bharti's career was cut short by her death on 5 April 1993 at the age of 19.The circumstances of her death, falling from the window ledge of her five-storey Versova apartment have been the subject of dispute over the years.Bharti's last completed films were Rang, co-starring Kamal Sadanah and Shatranj with Jackie Shroff, both released posthumously.
Divya Bharti was born on February 25, 1974, in Mumbai, India, the eldest child of Omprakash Bharti, an insurance officer and Meeta Bharti.Meeta Bharti was the second wife of Omprakash Bharti. She had a younger brother named Kunal. Bharti Studied at Maneckji Cooper High School in Juhu, Mumbai, in same era as actors Farhan Akhtar and Rani Mukherji attended. She was average in studies and completed grade 9th.

In 1988, Bharti met film-maker Nandu Tolani when she accompanied a friend. Upon seeing her, Nandu Tolani insisted that she become an actress. At that time Bharti was in the ninth standard. She was originally scheduled to make her screen debut in Gunahon Ka Devta in 1988, but her role was cancelled later.Kirti Kumar (Govinda's brother) noticed Divya at a video library, was eager to sign up Divya for Radha Ka Sangam opposite Govinda. Weeks later Kirti went personally to meet Dilip Shankar and managed to release Divya from their contract. Before the first shot was taken, Bharti was out of the film after being groomed for two years and replaced by Juhi Chawla.

Bharti's career was on end until D. Ramanaidu, one of the biggest producers of Telugu cinema offered Bobbili Raja opposite his son Daggubati Venkatesh. She commenced shooting for her first release. The film was released in the summer of 1990 and became a colossal hit.She was introduced as Rani, daughter of the minister who has had all the comforts of life. The film was considered a usual launch for a newcomer, However, she was eventually noticed for her role, particularly for the forthright character she played.

Although highly regarded for her acting abilities, Bharti acted in only one Tamil film titled Nila Penne opposite Anand Babu, the son of legendary actor, Nagesh who was most widely known for several leading roles in the early 1990s and his dancing exploits. The film was critically and financially unsuccessful.

With more hits, Bharti became a bigger name in Telugu cinema. In box-office ratings, she figured next to Vijayshanti. In 1991, Bharti gave back-to-back hits, including Rowdy Alludu and Assembly Rowdy opposite Chiranjeevi and Mohan Babu.

Later that year, A Kodandarami Reddy's action romantic Dharma Kshetram under Sri Rajeev Productions released. Bharti essayed the role of beautiful girl along with a prominent Telugu film actor Nandamuri Balakrishna, who then starred in many critical and commercial films with the highest number of dual roles . The film went on to become one of the biggest hits of Telugu cinema of its time. Nandamuri Balakrishna said about her performance, "This is an exceptional position reflecting an exceptional role she has played for us."











Bharti's first Bollywood film was Vishwatma opposite Sunny Deol, directed by Rajiv Rai which released on January 2, 1992. The film was an average grosser at the box office but gained Bharti wider recognition from the public as well as film critics. the film was only declared an average grosser. Notably, the music of the film was very successful especially the song "Saat Samundar" which became a favorite and gave Bharti the limelight into Bollywood.
Seven days later, Bharti's next film, Lawrence D'Souza's romantic drama Dil Ka Kya Kasoor alongside Prithvi and Sanam released but failed at the box office. Bharti's role was that of a girl by the name of Seema, who is secretly in love with a guy who wants to be a singer. She secretly helps him become a successful singer by writing songs for him but keeps her identity a secret from him. Through her songs he becomes popular and wealthy virtually overnight. The music of this film from duo Nadeem-Shravan was an instant hit due to its catchy melodies. But the film didn't do well at the box office. However, Filmfare magazines started including Bharti in the list of 1992 "Top Ten Best Actress Performances". After Bharti's flops, she was quoted as saying, "I wanted to prove myself. But I've fallen flat on my face. Now, I have to begin my climb all over again. Yet, I'm positive that one day, success will be mine." (Stardust, March 1992).

In March 1992, David Dhawan's Shola Aur Shabnam was released. Bharti starred as Divya, the love interest of Karan (Govinda). In the film, Karan and Divya both plan to marry each other. Circumstances act against them, and they flee together, with Kali Baba's (Gulshan Grover) men after them. Shola Aur Shabnam was popular with critics and was a box office hit in India,establishing Bharti once again. She received a Lux Face of the Year title. It also gave a big boost to Govinda's career, as well as launching David Dhawan as an established director.

















Four months later, Bharti received further success in Raj Kanwar's Filmfare award winning love story Deewana starred veteran actor Rishi Kapoor, and newcomer Shahrukh Khan. Bharti essayed the role of Kajal who falls in love and marries a famous singer named Ravi (Rishi Kapoor). After Ravi is presumed dead after falling off a cliff, the widowed and depressed Kajal meets a young man named Raja (Shahrukh Khan). Deewana grossed ₹ 14 crore, and Boxoffice India declared it a hit. Her performance in Deewana was highly appreciated.Critics reported that Bharti belonged to a new breed of Hindi film actors that breaks away from character stereotypes. Bharti and Shahrukh Khan both were awarded with Filmfare Award for Best Female Debut and Filmfare Award for Best Male Debut respectively.

By July 1992, Bharti's work in Deewana was said to have earned her more acknowledge. She was listed as one of the "Most Valuable Young Stars". She had several other releases that year like Jaan Se Pyaara, Geet and Balwaan with another debutant Sunil Shetty. Out of these, only Balwaan was a modest success, establishing Sunil Shetty as an action hero. Bharti's role was small, and was not well received. She was mostly criticised for taking a role of minimal importance. Although she explained that the decision was significant, so even when characters are being unkind it's hard not to like.

By the end of the year, she starred in Hema Malini's Dil Aashna Hai again co-starring Shahrukh Khan. The film tells the story of a young girl brought up in a brothel, who is a cabaret dancer in Digvijay Singh's (Kabir Bedi) five-star hotel. Digvijay's son Karan (Shahrukh Khan) falls in love with Laila. Laila is aided by Karan in the search for her birth mother and is determined to seek answers and find acceptance from her real mother. The film garnered negative reviews and poor box office returns. She described the role as an attempt to pretext her cursorial public image. Hema Malini labelled her role by stating that "The lady has not just looked glamorous but she has walked with symmetry, smiled with austerity and spoke with sangfroid" .
Bharti's last film release while she was alive was the ensemble film Kshatriya, released just 10 days before her death. Her last completed films were Rang and Shatranj which were released months after her death and dedicated to her memory. At the time of her death she had completed 80% shooting of the film Laadla before her role was recast with Sridevi. She was also set to star in films like Mohra, Vijaypath and Andolan before her role was recast with other actresses.

Bharti married film producer Sajid Nadiadwala in 1992.They had met in 1990 at Film City, when Sajid dropped by the sets to meet Govinda on the sets of Shola Aur Shabnam.

Around midnight of 5 April 1993, Bharti fell to her death from a five-stories Versova apartmental building in Mumbai. There was much speculation by the media regarding Bharti's sudden demise, including the possibility of suicide, accidental death, well planned conspiracy or even murder.Mumbai Police failed to find evidences and closed the investigation in 1998. Some conspiracy theories involved her husband Sajid Nadiadwala, while other theories suggested Mafia complicity. But the circumstances of her death still remain a mystery.
Bharti's body was released to her family, who had arranged for a cremation ceremony. On 7 April 1993, Bharti was cremated in a Hindu fashion.


Please have a look over the Portraits of heartthrob of all :   Divya Bharti .
We miss you & still loves you.....................

























- Rishabh Shukla


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