दोस्ती के नाम : 6


दोस्ती के नाम : 6 





'दोस्ती के नाम' की छठवीं श्रृंखला लिखते हुए एक बार फिर मन- मस्तिष्क हर्षोल्लास से भर उठा है. 'दोस्ती' एक ऐसा शब्द .....एक ऐसा रिश्ता है जिसे करना तो आसान है पर निभाना बेहद मुश्किल ......बिखरे तो सारा जहाँ आपका दोस्त हो जाता है पर सिमटे तो सिर्फ आप तक ही सीमित है ये दोस्ती ....एक 'दोस्त' को 'दोस्त' कहलाने के लिये किन कसौटियों पर खरा उतरना चाहिये , मुझे नहीं मालूम . मुझे तो बस इतना मालूम है कि यदि किसी को दोस्त माना है तो उस शब्द की इज्जत करो वरना किसी को 'दोस्त' मत कहो. 

आपके स्कूल डेस के समय के साथी ...... साथ पढ़ने वाले विद्यार्थी , हर कोई आपका दोस्त नहीं होता.... क्लासमेट्स और फ्रेंड्स में अंतर होता है.... ऐसे ही आपके साथ दफ्तर आदि में काम करने वाला हर व्यक्ति आपका दोस्त नहीं होता.......यहाँ कॉलीग्स और फ्रेंड्स में अंतर है......यहाँ तक की फेसबुक में हममें से बहुत से लोगों की फ्रेंड्स लिस्ट अमूमन 500-1000-2000 आदि की संख्या भी पार कर जाती है ......... पर क्या असल में वे सभी आपके दोस्त होते हैं? 

मेरे अनुसार तो इसका उत्तर है - 'नहीं '...... यह 500-1000-2000 आदि की संख्या सिर्फ समाज है .......फेसबुक रुपी समाज...... खैर, मैं खुशकिस्मत हूँ कि ज़िंदगी में मुझे चंद ही  सही पर सच्चे दोस्त मिले और आज अपने इस चिट्ठे को अपने उस प्रिय दोस्त के नाम कर रहा हूँ जो स्कूल डेस से मेरे साथ है......

मैंने अक्सर कुछ लोगों को कहते सुना है कि उनके स्कूल डेस उनकी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत दिन थे ...... 'काश वो दिन उनके जीवन में वापस आ जाएं'....... 'क्या दिन थे वे'... आदि ....... मेरे अनुसार शायद वे ऐसा इसलिये कहते रहते हैं चूंकि उनका वर्तमान उनको संतुष्टि प्रदान नहीं करता तभी वे कभी न कभी, कहीं न कहीं अपने अतीत में ही बने रहना चाहते हैं. वर्तमान में जिस आत्म संतुष्टि से वे वंचित हैं, उसे अपने अतीत में , अपने स्कूल डेस में ढूँढने की जद्दोज़ेहद् करते हैं.

परंतु मैं, अपने वर्तमान से बेहद संतुष्ट हूँ ..... बेहद खुश हूँ ..... अखिर अपने आज ..... अपने वर्तमान को खुशहाल व आनंददायक बनाने के लिये मैंने भरकस प्रयास किये हैं....... मेहनत की है..... और ईश्वर की कृ्पा से मैंने जो चाहा वो पाया...... अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जी रहा हूँ....... वो कहा जाता है ना कि, 'जितने  ऊँचे ख्वाब , उतने ऊँचे हाथ.' .......  पर फिर भी यदि मुझे कभी  अपने स्कूल डेस में वापस जाना पड़े और इसके सिवा मेरे पास कोई अन्य विकल्प ना हो तो मैं, अपने स्कूल डेस में अपने उन चंद दोस्तों के लिये ही जाना पसंद करुँगा जो मेरे लिये बेहद खास हैं...... मेरे हृदय के पास हैं...... उन्हीं दोस्तों में से एक हैं - ' श्री अमित कनोत्रा ' जी.






'अमित' , एक 6 फीट लंबा......खाते -पीते घर का.... सुंदर ..... श्याम वर्ण .....विनम्र ..... सहयोगी स्वभाव का खुशमिजाज़ युवक है. 

अमित और मैं, कक्षा दसवीं तक अलग - अलग सेक्शन्स में थे .... अमित 'B' Section में था और मैं 'C' Section  में था. 11वीं कक्षा { वाणिज्य संकाय } से हम एक साथ पढ़ने लगे.  अमित लगभग सभी शिक्षकों का प्यारा छात्र था.  पढ़ाई में काफी होशियार था. हमारी कक्षा के Top Students में से एक ......  स्पेशली Accountancy में  तो अमित Genius था ...... मैंने तो उस वक़्त ये दृ्ढ़ निश्चय कर लिया था कि मैं अपने Accountancy  के शिक्षक को छोड़ अमित से ही Accountancy  की क्लासेस लेने लगूँगा. हम स्कूल के बाद Tutorial Classes के लिये जाते थे ......... स्कूल में जो शिक्षक हमें Accountancy पढ़ाते थे , वे ही हमारी Tutorial Classes  भी लेते थे या इसे ऐसे कहें कि हम कुछ Intelligent विद्यार्थी अपने स्कूल के टीचर से ही Tutorial Classes लेते थे { क्यों ?????? समझदारों को इशारा ही काफी होता है ..... } . 

मैं, उन बंदों में से था जिसे वाणिज्य संकाय में Business Studies और Economics में बेहद रुचि थी .....  इन विषय में अक्सर highest marks मेरे ही आते थे. ... अगर मैं गलत नहीं तो Business Studies  में तो मेरे Non- stop highest marks  आते थे....इसलिये नहीं क्योंकि Business Studies Theoretical Subject  था बल्कि इसलिये क्योंकि Business studies is all about studying Business और Business means 'being busy'......... तो मैं हमेशा किसी न किसी activities में busy  रहता था जिसके परिणामस्वरुप  Accountancy  का मेरा काम पूरा नहीं हो पाता था ...... चूंकि अमित Accountancy के Genius बाबा थे तो उनका काम तो हमेशा ही  complete रहता था. 

ऐसी स्थिति में मेरे पास दो ही विकल्प बचते थे ....... या तो अपने शिक्षक की डाँट सुनो या अमित को ' दोस्ती के नाम' पर emotional करके उसके सारे काम की नकल उतार लूँ ..... पर अमित सच में एक अच्छा दोस्त था ..........वो मुझसे कहता कि, "ऋषभ ! ऐसा करने से तुम्हारा ही नुकसान होगा .....तुम्हें परीक्षा के समय दिक्कत होगी". आदि बातों से मुझे समझाता ... कभी - कभी तो ये भी कहता कि. "ऋषभ ! मैं तुम्हें प्रश्नों को हल करने का तरीकी { Method } समझा दूँगा फिर तुम खुद ही solve करना ...... इससे तुम्हारा काम भी पूरा हो जाएगा और  तुम्हारी practice भी हो जाएगी ." ...... मैं भी अमित की इन बातों पर हँसता और मन ही मन सोचता कि कहाँ से इस लड़के से मैंने notebook माँग ली वो भी  cheating  करने के लिये . 

ये छोटी- छोटी बातें ही इंसान की नियत दर्शाती हैं ..... अमित एक साफ दिल का इंसान था ...... हालांकि इसका ये अर्थ नहीं कि मेरी नियत में खोट थी या मैं एक cheater student  था ...... बस थोड़ा नट्खट था. खैर , किसी तरह स्कूल डेस खत्म हुए ...... मैं दिल्ली आ गया..... सारे पुराने दोस्तों का साथ छूट चुका था.... मेरे विद्यालय के कुछ शिक्षक और Administration की वजह से  स्कूल डेस के अंत तक मेरे अनुभव काफी कड़वे थे ......{ अधिक जानकारी के लिये पढ़े : ' मेरे विद्यालय के खिलाफ मेरी आवाज़' की 1, 2,3,4  श्रृंखलायें ,  मेरे अन्य चिट्ठे Rishabh Views On Modern Society  पर }   .

साल 2007 की बात है जब मैं कुछ समय के लिये वापस अपने घर आया ....एक दिन अचानक मेरी मुलाकात अमित से एक Cybercafe  में हुई. अमित बेहद खुश मन से एक अच्छे दोस्त की तरह मुझसे मिला ...... किसी भी प्रकार का छल - कपट नहीं था उसकी आँखों में .... हमनें कुछ देर  तक बात चीत की ...... मैंने अमित से हमारे अन्य दोस्तों के हाल चाल जानें.  थोड़ी देर बाद  हम अपने अपने कार्य में लग गए . Cybercafe से जाने से पहले अमित मुझसे एक बार पुन: मिला.  करीब 1 - 1.5 साल के बाद की इस मुलाकात में अमित के स्वभाव में परिवर्तन नहीं आया था ..... वो अभी भी एक Down- to- earth किस्म का इंसान था ..... उसकी बातचीत में अभी भी मासूमियत व निष्कपटता थी  , जो बेहद सराहनीय है..... उसके उलट अमित से मुलाकात के अगले ही दिन उसी Cybercafe  में मुझे मेरे साथ  के दो अन्य विद्यार्थी भी दिखे ......वे भी मेरी दोस्त ही थे ...... लेकिन इस 1-1.5 साल के अंतराल के बाद उनका जो रवैया मेरे सामने आया वो चौकाने वाला था . मुझे सामने आता देख उन्होंने मुझसे मुँह फेर के ऐसे रास्ता बदला , मानो साक्षात यमराज को सामने आता देख लिया हो . बड़ी ही Negative Vibrations  हुई उस वक़्त मुझे उनके रवैये से .... अब् ऐसे लोगों को जिनकी साल भर के भीतर ही फितरत बदल जाए, उन्हें मैं दोस्त कहने से परहेज करता हूँ . हालांकि फेसबुक की फ्रेंड्स लिस्ट में वे भी शामिल हैं परंतु बस Formality  के लिये . पर अमित को दोस्त कहने से पहले मुझे जरा भी सोचने की जरुरत महसूस नहीं होती ....वो सही मायनों में दोस्त कहलाने लायक है.







एक मजेदार वाक्या आप सबके साथ बाँटना चाहूँगा ....... लगभग हम सभी विद्यार्थी हमारे विद्यालय  में साइकिल से जाया करते थे ...चूंकि गाड़ी के लिये  license, helmet  आदि की आवश्यकता होती थी ... फिर उसे संभालने व उपद्रवी छात्रों से बचाने की झंझट ..... एक दिन Tutorial Classes  खत्म होने के बाद , अमित को बाहर आते-आते थोड़ा अधिक समय लग गया ...... ऐसे में हम सभी बाहर उसका इंतजार करने लगे. मेरे कुछ अन्य साथियों को थोड़ी शरारत सूझी और उन्होंने अमित के भोले स्वभाव का फायदा उठाते हुए उसे थोड़ा परेशान करने के लिये उसकी साइकिल थोड़ी दूर ले जाकर छिपा दी ....... मुझे लग रहा था कि अब कुछ गजब होने की आशंका है ...... अमित जी बाहर निकले ......... उन्होंने अपनी साइकिल ढूँढ़्नी शुरु की ...... जिन साथियों ने ये शरारत की थी वे मंद- मंद मुस्कुरा रहे थे..... अमित करीब 10-15 मिनट तक चुपचाप अपनी साइकिल ढूँढ़ता रहा ...... वैसे अमित को जल्दी गुस्सा आता नहीं था पर अचानक अमित जी की भृ्कुटि { भौंहें  } तन गईं ..... मुख रक्तवर्ण { लाल रंग } का हो गया ..... बड़ी - बड़ी आँखों में मानो खून उतर आया हो ..... मेरे अन्य साथियों ने जब देखा कि अमित को उनकी शरारत बुरी लग गई  है तो उन्होंने हँसते हुए बड़ी ही विनम्रता और थोड़ा शरारती अंदाज़ में उसकी साइकिल वापस कर दी...... वैसे वे सिर्फ शरारत ही कर रहे थे ..... अमित को किसी भी प्रकार से hurt करने का उनका कोई इरादा नहीं था. फिर भी उस दिन अमित का रौद्र रुप देख हम सभी अचंभित थे..... मेरे अन्य साथी तो अपने घर की ओर रवाना हो गए .... मेरा घर अमित के घर के रास्ते से होते हुए जाता था ..... तो मुझे समझ आ रहा था कि अमित को सच में काफी बुरा लगा  है ...... मैंने उसे थोड़ा समझाया पर अमित ने एक P.C.O पर अपनी साइकिल रोकी ..... अपने Bag से  Phone No. Diary निकाली ... और  P.C.O में चला गया .... मैं तेजी से उसके पीछे गया ..... मैंने अमित से पूछा कि वो किसको फोन कर रहा है ..... अमित ने कहा, " सर को ..... अभी  Complaint  करता हूँ .... सबका दिमाग सही हो जाएगा ...... " . ये सुनते ही मैंने तुरंत फोन Disconnect कर दिया ..... मैंने अमित को समझाया कि. "यार ! वो मज़ाक कर रहे थे....देखो अगर वो लोग ये शरारत न करते तो क्या हमें तुम्हारे इस दुर्लभ क्रोधित रुप के दर्शन हो पाते ".... अमित इस बात पर हँसने लगा ..... और  उसका गुस्सा शाँत हो गया. रास्ते भर तो मैं एकदम Serious रहा पर घर जाते ही करीब 1 घंटे तक पागलों की तरह  Non- Stop  हँसता रहा .... वो भी इस बात पर कि अगर मैं वक़्त रहते फोन ना Disconnect  करता तो उसका अंजाम क्या होता ????????

अमित ऐसा ही है. उसे जल्दी गुस्सा नहीं आता . पर यदि किसी से नाराज हो जाए तो अपनी खुन्नस निकालने के लिये सीधे Higher Authorities  से  Contact  करता है ...... तो दोस्तों जरा सावधान रहियेगा !! अमित की भोली - मासूम सूरत व शांत स्वभाव देख उससे शरारत करने या पंगे लेने से पहले 1000 बार सोचियेगा.....क्योंकि आप को बचाने के लिये हर बार 'ऋषभ शुक्ल' वहाँ मौजूद नहीं होंगे........  हा हा हा हा हा { मज़ाक कर रहा हूँ }.

मुझे अक्सर पाठकों के मेल आते हैं.....उनमें से ज्यादातर लोगों का कहना है कि मुझे व्यक्ति - विशेष की पहचान करनी आती है ..... कद्र करनी आती है.... किसी की शख्सियत को अपनी लेखनी द्वारा बेहद खूबसूरती से बयां करना आता है .....मुझे रिश्तों की बहुत अच्छी समझ है आदि आदि .....परंतु मुझे नहीं मालूम  इस चिट्ठे के माध्यम से अमित के जरिये दोस्ती के अनमोल रिश्ते को आप सबके कितना निकट ला पाया हूँ और अमित के व्यक्तित्व विश्लेषण में न्याय कर पाया हूँ या नहीं ....यदि ' नहीं' तो ये मेरी लेखनी की दुर्बलता व अभिव्यक्ति के दोषों के कारण हो सकता है पर अमित नि:संदेह एक बेहद सरल और साफ दिल का युवक है ..... वो एक अच्छा दोस्त है .....पराक्रमी है ... अपनी मेहनत व लगन से ज़िंदगी में सफलतापूर्वक आगे बढ़ने वाला ..... शीतल व गंभीर स्वभाव का युवक है ........  अमित की और अधिक प्रशंसा करना मतलब  सूर्य को दिया दिखाने जैसा ही होगा ..... अपने अच्छे व सच्चे दोस्त अमित के उज्जवल भविष्य की मैं कामना करता हूँ और अंत में इस चिटठे को इन पंक्तियों के साथ विराम दे रहा हूँ :-

अमित .... 
रब से बस यही करते हैं दुआ हम कि
आकाश में पंख लगाके उड़ जाओ तुम 
सफलता का  क्षितिज पार कर जाओ तुम 
सफलता की ऐसी मिसाल बन जाओ तुम
खुशियों से भर जाए जीवन तेरा 
ना हो जिसमें कभी कोई अंधेरा 
रोशनी के हर रोज दीप जलाओ तुम
आकाश में पंख लगाके उड़ जाओ  तुम 
रब से बस यही करते हैं दुआ हम कि
जीवन पथ पर  सफल होकर चलते रहो तुम, बढ़ते रहो तुम 
बस इतनी सी बात मेरी भी सुन लेना कि.....
कभी हमारी दोस्ती को तुम हल्के में ना लेना ....... 
अगर कभी मेरा यह ब्लाँग पढ़ने का मन ना भी करे तो....
अपने दिमाग की नहीं बल्कि दिल की  बात सुन लेना
और अगर दिल भी ना करे तो  अपने ही इस चिट्ठे को दुबारा पढ़ लेना 
और कभी थोड़ी बहुत तारीफें भी कर देना.......



आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :

                                              - ऋषभ शुक्ल

copyright©2012-Present Rishabh Shukla.All rights reserved
No part of this publication may be reproduced , stored in a  retrieval system or transmitted , in any form or by any means, electronic, mechanical, photocopying, recording or otherwise, without the prior permission of the copyright owner.

Copyright infringement is never intended, if I published some of your work, and you feel I didn't credited properly, or you want me to remove it, please let me know and I'll do it immediately.

Comments

  1. दीपा सक्सेना25 January 2013 at 04:58

    बहुत बढ़िया ऋषभ जी ... आप सच में कमाल हो ........ बहुत सुंदरता से आपने एक बार पुन: ' दोस्ती ' के अन्मोल रिश्ते को परिभाषित कर दिया. आभार
    - दीपा सक्सेना

    ReplyDelete
  2. Madura Verma, Surat25 January 2013 at 05:00

    awesome read .....lovely & sweet blog
    - Madura Verma, Surat

    ReplyDelete
  3. witty article with beautiful & amazing humour ,,,congrats rishabh & amit ...keep blogging ..keep sharing your wonderful views through 'dosti ke naam'.
    -ANURAG SINGH

    ReplyDelete
  4. आप को सच में रिश्तो की समझ है .....अपको किसी की शख्सियत को खूबसूरती से बयां करना भी बखूबी आता है ...... परंतु आप की लेखनी के जरिये यदि कोई आपको समझना चाहे तो ये बेहद मुश्किल होगा ...... बहुत सुंदर उतार - चढावों का समावेश होता है आपके लेखों में .......जीवन की सच्चाई ....practicality से भरपूर लेख ..बधाई.
    - अनुराधा .


    ReplyDelete
  5. माया सिंह25 January 2013 at 05:29

    उत्कृ्ष्ट लेख ......बहुत सुंदर कला.
    - माया सिंह, दिल्ली

    ReplyDelete
  6. रुपल तोमर25 January 2013 at 05:34

    आप लेखनी की कला, चित्रकारी की कला के साथ- साथ रिश्तों को संजोने की कला में भी माहिर है.आपकी ई- मेल पे अपनी कुछ पेंटिंग्स भेजी हैं यदि उचित समझे तो अपने इस ब्लॉग पर जगह जरुर दीजियेगा.... धन्यवाद

    - रुपल तोमर , चंडीगढ़

    ReplyDelete
  7. रवनीत कौर25 January 2013 at 05:37

    आप लेख पढ़कर ऐसा लगता है मानो लस्सी के ग्लास में vodaka shot है मिला ........ रवनीत कौर

    ReplyDelete
  8. mujhe to itni baatein yaad bhi nhi thi bro...thanks mujhe apne bachpan ke time and amit ki baatein yaad dilane ke liye....

    ReplyDelete
  9. u right archit itni baatein tu mera ku bhi yaad nhi hai ...par he remember evrything ....gud wrk dude....

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

Queen of Hearts : Divya Bharti

गायन , वादन तथा नृ्त्य कला .

Angel of Silver Screen, the Venus Queen : Madhubala