Thursday, 15 August 2013

आज़ादी के सही मायने ..........





आज़ादी के सही मायने ..........



 
सर्वप्रथम आप सबको  स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई. 'आज़ादी' एक ऐसा शब्द है जो हममें सुकून, शांति , स्थिरता व सुरक्षा की भावना जाग्रत करता है. आज़ादी की बात करते हुए हम अक्सर मुल्क और हुकमरानों से इसका हिसाब माँगते हैं. पर प्रश्न यह उठता है कि क्या आज़ादी कोई बाहर से थोपी जाने वाली चीज़ है , जिसे आप जबरन किसी से ले ही लेंगे? मानते तो हम यही हैं पर असलियत में यह हमारे भीतर से ही आती है.

'स्व-तंत्र' का मतलब है हम पर हमारा ही शासन . 'इन-डिपेंडेंस' का भी मतलब है निर्भरता से मुक्ति. एक व्यक्ति के तौर पर हमारा खुद पर नियंत्रण हो और हम दूसरों के मोहताज न हों, तो यही स्वतंत्रता है, आज़ादी है. आज़ादी का सीधा तात्पर्य है हमारी ज़िंदगी से जुड़े सभी निर्णय लेने और विकल्प चुनने की पूरी आज़ादी . बाहर की दुनिया भांति-भांति के लोगों के संगम से बनी है. अलग-अलग लोग और आज़ादी को लेकर सबकी अलग-अलग धारणायें व सोच. हर कोई अपने ढंग से आज़ादी की व्याख्या करता है, आज़ादी को परिभाषित करता है.  

आज आज़ादी के इतने वर्षों के बाद भी लोगों की सोच, स्थितियों में ज्यादा सुधार नहीं आया. विकृ्त , संकीर्ण मानसिकता का अंत हो चुका है ..यह कहना स्वंय को धोखा देना होगा. हमारे आधुनिक समाज में , हमारे आज़ाद भारत में आज भी जेंडर डिसक्रिमिनेशन , बाल शोषण , सेक्शुअल हैरसमेंट , मॉलेसटेशन ,भ्रष्टाचार, महंगाई, अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी, बलात्कार, दहेज हत्या, अंधविश्वास , आतंकवाद, पर्यावरण समस्याऎं, कन्या भ्रूण हत्या, आनर किलिंग आदि परेशानियाँ विद्यमान हैं. और आज़ाद होने के बावजूद हम हमारे समाज को निरंतर खोखला करने वाले इन मुद्दों के खिलाफ कुछ नहीं कर पा रहे हैं , बस मूक दर्शक बने बैठे हैं. कारण वही है कि हम सोचते हैं कि हमारी आज़ादी हमें कोई और देगा ...हमारी आज़ादी की चाभी किसी और के पास है. कभी एक दिन ऐसा आएगा जब इन परेशानियों से हमारा समाज मुक्त होगा , आज़ाद हो जाएगा..... पर प्रश्न यह है कि आखिर वो दिन कब आएगा? इसका उत्तर साफ है....निसंदेह तब तक तो बिल्कुल नहीं जब तक हर व्यक्ति आज़ादी के सही मायनों को समझ, समाज की बंदिशों से , विकारों से मुक्त होने का स्वत: प्रयास नहीं करेगा.

एक इंसान के तौर पर हमें हमारे समाज को बेहतर बनाने के लिये प्रयासरत होना चाहिये. व्यवस्था को तो बहुत कोस लिया हमने , अब वक्त है कि जागरुक होकर हम समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें .

इसके अलावा जब बात आज़ादी कि हो रही है तो कुछ बातों को समझना बहुत जरुरी हो जाता है. ... स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में बहुत अंतर होता है . आज़ाद होकर किसी कार्य को अंजाम देने पर हमें अधिकार प्राप्त होता है इसके विपरीत स्वच्छंदता से कार्य करने पर हमसे अधिकार छीन लिया जाता है. स्वतंत्रता का आधार नियम व अनुशासन में रहना है. आत्म अनुशासन का पालन करते हुए खुद अपनी स्वतंत्रता की सीमाएं निर्धारित करें, तभी व्यक्ति के साथ देश व समाज का भी विकास संभव होगा.
याद रखिये,
                  " सुधारेंगे खुद को तो सुधरेगा तंत्र,
                      देश में बदलाव का बस यही है मंत्र."

 

हम यदि सच में आज़ादी की एहमियत समझतें हैं तो स्वंय के भीतर भगत सिंह, रानी लक्ष्मीबाई, सुभाष चंद्र बोस, वीर शिवाजी को ढूढ़ने का प्रयास करें न कि पड़ोसी के घर इनके पुनर्जन्म की दुआ.




 

इन अहम मुद्दों के अलावा आज स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उस नामचीन शख्सियत की यदि बात नहीं की तो खुद से बेईमानी करने जैसा होगा . मैं बात कर रहा हूँ सिनेमा जगत के मशहूर सितारे  हमारे भरत कुमार,श्री मनोज कुमार जी की . फिल्म 'शहीद' में मनोज कुमार ने जिस शिद्दत से भगत सिंह के किरदार को जीवंत किया , उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता. 1967 में आई फिल्म 'उपकार' में उन्होंने हमारे देश के जवानों व किसानों के संघर्षों को दर्शाया जिसका गीत ' मेरे देश की धरती सोना उगले..उगले हीरे मोती' आज भी हमारे देश की गौरवशाली खूबियों व संस्कृ्ति की याद दिलाता है. मनोज कुमार ने सिल्वर स्क्रीन के जरिये  हमारे देश के गौरवशाली इतिहास व आज़ादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों व जवानों की भूमिका व बलिदान को जन-जन तक पहुंचाया है ..... वे सही मायनों में भरत कुमार हैं .....




 
आज की युवा पीढ़ी को मनोज कुमार से व उनकी देशभक्ति पर आधारित फिल्मों से प्रेरणा लेनी चाहिये .... मीनिंगफुल सिनेमा की यदि बात करें तो मनोज कुमार का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिये क्योंकि मनोज कुमार की देशभक्ति पर आधारित फिल्में इस तथ्य का साक्षात  उदाहरण हैं कि मनोरंजन का  अर्थ सिर्फ नाच , गाना, बजाना , रोमांस नहीं .....पर्वतों पर चढ़ कर सुंदर- सुंदर हिरोइनों पर प्रेम वर्षा कर अधेड़ हीरो के ठुमके हर वक़्त  दर्शकों का मनोरंजन प्रदान  नहीं कर सकते ....बल्कि ऐसी फिल्मों के जरिये जिस काल्पनिक दुनिया को दर्शकों के मनोरंजन के लिए परोसा जाता है , वह वास्तविकता से बिल्कुल दूर है.......... मनोरंजन के साथ - साथ हमें सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम के जरिये उन लोगों को भी हर वक़्त याद रखना चाहिये जिनके अथक प्रयास के द्वारा ही हम आज आज़ादी का लुत्फ उठा पा रहे हैं . 



मनोज कुमार की देशभक्ति पर आधारित फिल्में हमें अपने देश से प्रेम करना सिखती हैं .... जो आज़ादी हमें मिली है, उस आज़ादी का मान रखना सिखाती हैं व अपने देश पर मर- मिटने की प्रेरणा देती हैं. ऐसे दक्ष व महान कलाकार को स्वतंत्रता दिवस पर हमारा सलाम !

आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :
                                                      

                            - ऋषभ शुक्ल



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Tuesday, 21 May 2013

GUEST BLOG : LIFE OF AN ARTIST




GUEST BLOG : LIFE OF AN ARTIST


Presenting : Mr. Vivek Srivastava
Written By : Miss. Swapnil Shukla




Life of an Artist .

Art of Vivek .

 
मस्कार पाठकों !

कला ईश्वर के द्वारा निर्मित एक बहूमूल्य वस्तु नहीं ..... बल्कि कला ईश्वर के द्वारा हम प्राणियों को दिखाया गया एक रास्ता है जिसके द्वारा हम अपनी ज़िंदगी को प्रसन्नता व खूबसूरती से लैस कर सकते हैं. कला एक शक्ति है खुद को जानने व पहचानने की , एक सशक्त माध्यम है खुद के विचारों को औरों तक पहुँचाने के लिए  .... लोगों को जागरुक करने के लिए और यदि मैं, अपनी बात करुँ तो मेरा मानना यह है कि कला एक भाषा है जिसके द्वारा हम अपनी भावनाओं , अपनी इच्छाओं को व्यक्त कर सकते हैं .... कला के द्वारा हम दूसरों की भावनाओं और स्थिति को भी दर्शा पाने में सक्षम हो पाते हैं .... इस दुनिया में विभिन्न धर्म हैं .... विभिन्न संस्कृ्तियाँ व परंपरायें हैं.... विभिन्न भाषायें हैं....... लेकिन इन विभिन्नताओं में कला की भाषा सामान्य है और वो भाषा है भावनाओं की भाषा जो हर किसी को समझ में आती है .

आज अपने ब्लॉग ' स्वप्निल सौंदर्य ' पर आप सभी का साक्षात्कार एक ऐसी शख्सियत से कराने जा रहीं हूँ जिनके सिर पर माँ सरस्वती का साक्षात हाथ है ...जिन्हें ईश्वर की तरफ से वरदान के रुप में चित्रकला का गुण प्राप्त है .....कला के क्षेत्र में बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के बावजूद इनकी चित्रकला अत्यंत मनमोहक व अतुल्य है ........... मैं बात कर रही हूँ अपने स्कूल डेस के मित्र 'श्री विवेक श्रीवास्तव जी' की .

'विवेक' मानते हैं कि बिना रचनात्मकता के कला जीवित नहीं रह सकती क्योंकि रचनात्मकता और मौलिकता ऐसे प्रमुख गुण हैं , जिनसे कला निखरती है.
विवेक अपनी पेंटिंग्स में इन्हीं गुणों को शामिल करते हुए अक्सर नए - नए प्रयोग करते रहते हैं. विवेक के अनुसार आज एक्स्पेरिमेंट्स का दौर है. आज  पेंटिंग्स सिर्फ कैनव़स तक ही सीमित नहीं है. कला का क्षेत्र दिनों दिन व्यापक रुप लेता जा रहा है.

विवेक की चित्रकला अदभुत है ..... इनकी चित्रकलाओं में आश्चर्यचकित कर देने वाली खूबसूरती व बारीकी साफ तौर पर देखी जा सकती है . इनके द्वारा बनाई गई हर पेंटिंग को देख ऐसा महसूस होता है कि मानो कलात्मक विचारों से जन्मीं इनकी चित्रकला संपूर्ण होते ही कैनव़स या पन्ने के दाय्ररों को पार करती हुई आपके समक्ष जीवंत हो उठेगी ..... सीधे शब्दों में कहा जाए तो कलात्मकता व रचनात्मकता को सजीवता प्रदान करने की शक्ति है विवेक के हाथों में .

विवेक एक सच्चे कलाकार हैं. कहा जाता है कि एक कलाकार का व्यक्तित्व बेहद स्वतंत्र व बेबाक होता है . विवेक भी ऐसे ही हैं.... गंभीर व्यक्तित्व , स्वतंत्र विचार , थोड़े मूडी और ज़िंदगी को अपने अंदाज़ में जीने वाले विवेक एक सच्चे मित्र होने के नाते मेरे हर एक कार्य के प्रशंसक है ...... आप सभी पाठकों के साथ एक मज़ेदार बात बाँटना चाहूँगी..... असल में मुझे और मेरे भाई ऋषभ को भी ईश्वर की कृ्पा से चित्रकला का गुण वरदान स्वरुप प्राप्त है और हम दोनों भी सच्चे कलाकार हैं पर जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही जहाँ विवेक एक गंभीर, शांत एवं सहयोगी स्वाभाव के कलाकार हैं वहीं मैं और मेरे भाई ऋषभ हठी , ज़िद्दी और थोड़े से ईर्ष्यालु स्वभाव के कलाकार हैं.... कहने का तात्पर्य यह है कि स्कूल डेस में हमारा स्वभाव कुछ ऐसा था कि यदि किसी भी कार्य में हमसे कोई बेहतर होता तो भीतर ही भीतर हम थोड़े ईर्ष्यालु हो जाया करते थे.....खैर, उस वक़्त बचपना भी था .... अब समझ आ गई है तो ये खराब आदत में भी परिवर्तन आ गया है . पर जब विद्यालय के दिनों में एक बार एक आर्ट कॉमपटिशन में मैंने, ऋषभ, विवेक और कुछ अन्य बच्चों ने पार्टिसिपेट किया तो कहीं न कहीं हमें पता था कि इस प्रतिस्पर्धा में या तो सिर्फ मैं जीतूंगी या मेरा भाई ऋषभ ...... हमारी कला विषय की शिक्षिका को भी हम पर पूर्ण विश्वास था ...तब मुझे और ऋषभ को इस बारे में भनक भी नहीं थी कि विवेक चित्रकला में हमें कड़ी टक्कर देने वाले हैं.......... आर्ट कॉमपटिशन् हमारे विद्यालय में न होकर अन्य विद्यालय परिसर में था .... हम वहाँ पहुँचे ... आर्ट कॉमपटिशन का विषय था ' जनसंख्या वृ्द्धि ' ... और समय अवधि थी 'एक घंटा' और जैसे कि मुझे अनुमान था कि आर्ट कॉमपटिशन् का विषय और इतनी कम समयावधि सुनते ही आधे से ज्यादा बच्चे हिम्मत तोड़ देंगे और हुआ भी कुछ ऐसा ही ...इस पर मैं और मेरा भाई ऋषभ एक दूसरे की ओर देख मंद -मंद मुस्कुरा रहे थे. जैसे ही निरीक्षक ने हमें शीट प्रदान कि हमने अपने बगल में देखा तो विवेक जी ने शीट मिलते ही फटाफट - खटाखट स्कैचिंग करनी शुरु कर दी.... मैंने और ऋषभ ने एक दूसरे से धीरे से कहा, "देखो, कितनी ओवर स्मार्टनेस दिखा रहे हैं.... जैसे ये कॉमपटिशन ये ही जीत जाएंगे " और विवेक को इरिटेट करने के लिये मुँह चिढ़ाते हुए अपना कार्य करने लगे .... विवेक ने मेरी और ऋषभ की ये बचकानी हरकतें देख तो ली थीं पर विवेक बहुत समझदार और गंभीर स्वभाव के थे तो उन्होंने हँसते हुए टाल दिया . उसके बाद विवेक ने तो जल्दी- जल्दी बहुत ही सुंदर चित्र जनसंख्या पर बना भी लिया और उसमें रंग भी भरना शुरु कर दिया और मैं तो विवेक की पेंटिंग कंपलीट भी होने वाली है , यह  देख हड़्बड़ाहट के चलते निश्चित जगह पर गलत रंग भरने लगी ...... ऋषभ ने जब मुझे गलत रंग भरता देखा तो उसने कहा, "अरे स्वप्निल दीदी ! यहाँ ये रंग नहीं होगा "......ऋषभ के कहने पर जब मैंने गौर किया तो मैंने पाया कि हाँ मैंने तो हड़्बड़ाहट में गलत रंग भर दिए ...फिर मैंने ऋषभ से कहा कि, "अरे ऋषभ मेरी छोड़ो विवेक की पेंटिंग देखो कितना अच्छा बना लिया इन्होंने"  ..... ऋषभ ने मुझसे कहा कि, "हम दोनों से बेहतर कोई बना पाया है आज तक ...चित्रकला में तो हम दोनों ही उस्ताद है".... यह कहते हुए मेरे प्यारे भइया ने अपनी पेंटिंग बनाते- बनाते पीछे विवेक की पेंटिंग देखी और बस ऋषभ भी मेरी ही तरह ईर्ष्या की अग्नि में जल उठा ......हम दोनों भाई- बहन विवेक को देखे जा रहे थे तब तक विवेक ने थोड़ा मुस्कुराते हुए हमसे कहा, "क्या हुआ मेरा चित्र तो कंपलीट हो गया है... मैं आप लोगों की हेल्प कर देता हूँ" और बस विवेक के ये कहते ही हम दोनों और तिलमिला गए .....ऋषभ ने बड़े ही खीजते हुए विवेक से कहा, " जी नहीं! हमें आपकी हेल्प  की कोई जरुरत नहीं "...... और ऋषभ की इस बात पे मैंने उससे कहा, "बहुत सही ऋषभ ! बहुत सही ! "....... और हम लोग वापस अपना काम करने लग गए...... हमारे इस घमंडी ऎटीट्यूड को देख विवेक बस " अरे !!! " कह कर रह गए ...... खैर, एक घंटा बीत गया पर उस दिन न मेरी पेंटिंग पूरी हुई और  न ही ऋषभ की और हुआ वही जिसकी हमें उम्मीद न थी कि वो आर्ट कॉमपटिशन में पहला पुरस्कार जीता श्री विवेक श्रीवास्तव जी ने ........
खैर, वो बचपने की बातें थी ..... जब हममें समझ आई तो हमें अहसास हुआ कि हम दोनों गलत थे ..... विवेक तो सच्चे हृ्दय से हमारी मदद ही कर रहे थे ..... आज भी कभी जब वो वाक्या मुझे या ऋषभ को याद आता है तो हम लोगों को बहुत हँसी आती है ............

विवेक की चित्रकला बेहद सराहनीय है.... इनके द्वारा बनाई गई हर कलाकृ्ति देख मन-मस्तिष्क प्रसन्नता से भर उठता है ....... तो आइये 'स्वप्निल सौंदर्य' के ज़रिये चलते हैं 'श्री विवेक जी' द्वारा रचित एक कलात्मक दुनिया में जहाँ आप और हम सभी पाठक रंग जाएं एक कलात्मक परिवेश में. 


 

















विवेक के बारे में :


 

"हाथों में जिनके, कला का जादू, कुछ इस कदर बोले
कि हर कलाकृ्ति में जैसे वो जीवंतता को घोलें
कला है इनकी इतनी हसीन, मानो गीली मिट्टी की सौंधी सी खुशबू,
वो बारिश के मौसम की पहली बूँद, दिलो दिमाग में शीतलता कुछ इस कदर छा जाए
कि सुंदरता का पर्याय बस 'विवेक' की चित्रकला ही बन जाए ."


 

पेशे से आई.सी.एस ऎप्लिकेशन स्पेशलिस्ट और हृदय से चित्रकार विवेक का मानना है कि मनुष्य के अनुभवों और रचनात्मकता के संगम से कला का जन्म होता है. चित्रकला के क्षेत्र में पॉरट्रेटस {Portraits} के अलावा विवेक को लैंडस्केप { Landscape }, स्टिल लाइफ़ {Still life } आदि  में भी विशेष महारथ प्राप्त है.




Written By :-

            - स्वप्निल शुक्ल


Presented and Posted By :

               - ऋषभ  शुक्ल




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Friday, 10 May 2013

Bollywood Inspiration : ' माया '



Bollywood Inspiration  : ' माया ' 


'मुंबई' जिसे हम माया नगरी के नाम से भी जनते हैं . यदि कहा जाए कि माया नगरी की माया का संबंध 'सिनेमा' से है तो यह गलत नहीं होगा.  सिनेमा की चकाचौंध का हर कोई दिवाना है . कोई सिनेमा जगत का हिस्सा बन इसका लुत्फ उठाना चाहता है तो कोई दर्शक के तौर पर सिनेमा जगत की माया का वशीभूत होना चाहता है . आज भारतीय सिनेमा जगत किसी पहचान का मोहताज नहीं . इसी सिनेमा जगत ने हमें हमारे पसंदीदा कलाकारों के रुप में नायाब रत्न दिए.  यह वही सिनेमा है जिसने हमारे समक्ष बेपनाह खूबसूरती के उदाहरण प्रस्तुत किए और कई बार तो ज़िंदगी की वास्तविकता का बोध भी कराया.

जमाना बदला ..... आज के परिवेश में सिनेमा समाज को प्रभावित ही नहीं कर रहा बल्कि हमारे समाज में होने वाली घटनायें व मान्यतायें सिनेमा को भी प्रभावित करती हैं . सिनेमा कहीं न कहीं हमारी वास्तविक ज़िंदगी का पर्याय बनता जा रहा है . शायद् यही माया नगरी की  'माया' है . फिलहाल एक दर्शक व सिनेमा का कट्टर प्रेमी होने के नाते मुझे भी सिनेमा के द्वारा बहुत ही खूबसूरत प्रेरणायें मिलती हैं . एक कलाकार हूँ व खूबसूरती का दिवाना ....... अत:  अपनी कला की प्रेरणाओं को सिनेमा जगत में ढूंढ़ता हूँ और विश्वास मानिये ऐसा करते हुए मुझे कभी निराशा नहीं हुई . 


सूंदरता शब्द का पर्याय बन चुकीं सिनेमा से जुड़ी वे तमाम नायिकायें मेरी कला की प्रेरणा हैं जिनको बचपन से लेकर आज तक देखता आ रहा हूँ.  वक़्त बीतता जा रहा है , समय बदलता जा रहा है तो जाहिर सी बात है चेहरे भी बदलेंगे पर कहा जाता है न कि हम तो कल भी थे आज भी हैं और कल भी रहेंगे .....बस यही है सिनेमा जगत की माया.... और इसकी इसी माया से प्रेरणा लेकर बीते समय से लेकर आज के वर्तमान समय की बेपनाह खूबसूरती व अभिनय क्षमताओं की मिसाल , मेरी पसंदीदा नायिकाओं के हुस्न को पन्नों पर उतारने की कोशिश मात्र कर रहा हूँ. उम्मीद है हर बार की तरह इस बार भी पाठकों के प्रेम की वर्षा मेरे मन- मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करेगी और बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देगी. 


तो प्रस्तुत है आप सभी के समक्ष Bollywood Inspiration  के अंतर्गत ' माया '  :

 



















































































आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :

                                                      - ऋषभ शुक्ल






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