दोस्ती के नाम : 04


 दोस्ती के नाम : 04

दोस्ती के नाम की चौथी सिरीज़ ( श्रृंखला )  लिखते हुए बेहद प्रसन्नता का अहसास हो रहा है और हो भी क्यों न इसके जरिये चंद पलों के लिये ही सही पर् मैं उन खूबसूरत यादों व पुराने समय में वापस चला जाता हूँ जहाँ मेरी मुलाकात उन व्यक्तियों से हुई जो देखते ही देखते मेरे हृ्दय के करीब हो गए.  उनकी यादें मेरे लिये खास बन गई . और शायद उन लोगों के लिये भी दोस्ती की खट्टी- मीठी यादें उतनी ही खास है जितनी मेरी लिये हैं.
 

आज टाइम मशीन पर सवार होकर एक बार पुन: अपने स्कूल डेस में आ गया हूँ......................

11वीं कक्षा ...... वाणिज्य संकाय....... नया सत्र.........पहला दिन...... मैं विद्यालय के निश्चित समय से थोड़ा पहले ही विद्यालय में प्रवेश कर चुका था. 11वीं -  'ब' कक्षा से मेरी शिक्षा की नई शुरुआत होनी थी . नए दोस्त बनने थे . नई कहानियाँ बननी थीं व रचनी भी थीं.  कक्षा का ताला खुला था.  मैंने दरवाज़े को खोला ....... सन्नाटा ......हर ओर सन्नाटा छाया था..... घोर सन्नाटा और सन्नाटे को चीरती सनसनी दस्तक दे रही थी. .....वो भी मेरे रुप में. हा हा हा हा.........
 

कक्षा की दहलीज़ पर खड़े होकर खुद से शपथ ली कि खूब मेहनत से पढ़ूंगा .......जियूँगा और जीने दूँगा.....थोड़ा चुप रहूँगा ...शाँत रहूँगा किंतु तब तक, जब तक धैर्य कायम रहेगा ....यदि एक बार भी किसी के कारण भी मेरी मानसिकता खराब हुई तो उक्त व्यक्ति का जीना हराम करुँगा..... यह भी बढ़िया काम करुँगा बाकि समय कक्षा में थोड़ा आराम करुँगा.
कक्षा में प्रवेश करते  ही अपने लिये सीट चुनी और अन्य विद्यार्थियों के आने का इंतज़ार करने लगा. थोड़ी ही देर में बच्चे आना शुरु हुए. ज्यादा समय नहीं बीता था कि सामने से एक बेहद मासूम,  शक्ल से भोला- भाला , हिरण जैसी खूबसूरत आँखें और उन आँखों में निष्कपटता , श्वेत वर्ण .....मासूमियत के साक्षात उदाहरण के रुप में 'श्री अर्चित मिश्र जी' , अपने मित्र के साथ कक्षा में प्रवेश कर रहे थे. 'अर्चित' ने अपने लिये सीट चुनी..... अपना काला बैग सीट पर रखा...... गहरी साँस ली और फिर अपने दोस्त के साथ मेरी ओर बढ़ कर हाथ मिलाया.....उसने अपना परिचय दिया....अपने दोस्त का परिचय मुझसे कराया ......मैंने भी अपना परिचय दिया  और हमारी दोस्ती की शुरुआत हो गई.  मैं, अर्चित को समझने की कोशिश कर रहा था. मुझे लगता था कि अर्चित जैसे इतने मासूम युवक की कैसे बसर होगी चूंकि हमारे विद्यालय के वाणिज्य संकाय के बच्चे अमूमन थोड़े तेज- तर्रार होते थे. पर जब मैंने मिश्रा जी को थोड़ा और जाना समझा , उनकी बाते सुनीं तब मुझे अहसास हुआ कि अर्चित जी आखिर जीज़ क्या हैं..... उनकी शख्सियत को बयान करने के लिये ये चंद पंक्तियाँ ही काफी होंगी :

अब क्या करें उनकी अपनी जुबान से तारीफ ,
जिनकी सूरत तो है मासूमों की.
गर शख्सियत की बात करें उनकी ,
तो सिर्फ और सिर्फ याद आती हैं,
फितरते शातिरों की. 




जी हाँ,  वाकपटुता इनमें कूट - कूट के भरी थी. अर्चित जी से बात करते वक़्त आप को अपने दिमाग का बल्ब आन ( Bulb On ) करना आवश्यक होता था...... कुल मिलाकर अर्चित की बातचीत से ही उसकी बुद्धिमत्ता का अंदाज़ा लगाया जा सकता था...... तर्क शास्त्र में तो उन्होंने मानो हायर डिग्री ले रखीं थी. साहसी , हाज़िर- जवाब , खुशमिजाज़ , थोड़े हठी , सहयोगी व्यवहार वाले व निडर ऐसे थे मेरे यार 'श्री अर्चित मिश्रा जी' :)
ये तो हो गई अर्चित के व्यक्तित्व की बेसिक चर्चा..... आईये अपनी यादों के पिटारे से कुछ खास यादों को आप सभी के साथ ताजा करते हैं....... 
 

बात 11वीं कक्षा की है ..... भूगोल विषय के हमारे अध्यापक काफी सख़्त स्वभाव के थे ...... परंतु अर्चित को वो काफी पसंद करते थे...... उन्होंने अर्चित को शायद पिछली कक्षाओं में भी पढ़ाया था..... और अर्चित पढ़ाई में काफी होशियार भी था.  मैंने भी भूगोल विषय ले रखा था. हमें भूगोल विषय की पढ़ाई के लिये मानविकी संकाय की कक्षा में  जाना पड़ता था. मेरा उन अध्यापक से पहली बार सामना हो रहा था..... काफी सुना था उनके बारे में कि वो काफी सख़्त हैं ..... कक्षा शुरु हुई .... अर्चित के साथ मैं पहली सीट पे बैठा था ..... कक्षा शुरु होने के 15 मिनट बाद मुझे जोर की नींद आने लगी ..... जैसे ही सर् जी ब्लैक- बोर्ड पर लिखने को होते मैं एक झीम ले लेता ...... अर्चित ने जैसे ही मुझे नींद के मज़े लेते देखा, उसने मुझे जोर से झकजोर दिया .... बड़ा क्रोध आया अर्चित पर .... अर्चित ने धीरे से मुझे चेतावनी दी कि, " ऋषभ ! अपनी हरकतो को विराम दो ..... इस कक्षा में तुम नींद का आनंद नहीं उठा पाओगे ......ये सर कड़क मिजाज़ के हैं " ........ मैंने अर्चित से धीरे से कहा कि, "अरे ! जब तक वो ब्लैक- बोर्ड पर लिख रहे हैं तब तक ही तो थोड़ी सी नींद का आनंद् ले रहा हूँ.....तुम तो जग रहे हो जैसे ही सर लिखना बंद करें तुम मुझे इशारा कर देना" ...... अर्चित ने मुझे आश्वासन दिया कि,"ठीक है, मेरे दोस्त मैं हूँ ना !" ....और अगले ही पल मुझमें कुंभकरण् की आत्मा समा गयी. और मैं सो गया ....... कोई अवरोध नहीं पड़ रहा था मेरी नींद में ..... कितना समय बीत गया मुझे पता नहीं चला ..... अचानक मुझे बड़ी तेज Negative Vibrations feel होने लगीं....जब नींद खुली तो देखा कि सर जी अपनी टेबल पर बैठ एकटक मुझे घूर रहे थे ...... उनकी घूरती आँखों को देख मैंने तुरंत अर्चित को घूरा और अर्चित मंद- मंद मुस्कान के साथ एक अच्छे - बच्चे की तरह ब्लैक बोर्ड में लिखी चीज़े अपनी कॉपी पर उतार रहा था..... मैं समझ चुका था कि अर्चित ने अपनी दोस्ती निभा दी और अब इस मुसीबत में मुझे डाल कर जीवन भर के लिये मुझे सबक सिखा दिया कि कक्षा में कभी भी सोना नहीं चाहिये.  यही एक सच्चे दोस्त की निशनी होती है ......खैर , हम भी कुछ कम नहीं थे ..... हमने भी अर्चित से ज्यादा मासूम चेहरा बनाया और सर से बड़ी ही विनम्रता से कहा ..... "माफ कीजियेगा सर ! पता नहीं कैसे आँख लग गयी ...सुबह से बुखार मह्सूस हो रहा है ... आपकी अनुमति हो तो मैं मुँह धुल लूँ ताकि नींद के साथ अपनी गलती को भी धो सकूँ ".... सर जी मेरा चेहरा देख कर रह गए .......उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा. और अपनी नज़रें फेर ली और उनकी नज़रे फेरते ही मेरी नजरें अटक गईं अर्चित पर .........
खैर , अपने सर के बड़प्पन का मैं , सम्मान करता हूँ कि उस दिन के मेरे बचपने को उन्होंने नज़रअंदाज़ कर दिया ......चूंकि उन्हें भी पता था कि असल में मैं भी हूँ तो एक शिष्ट और होशियार छात्र ही बस थोड़ा शैतान जरुर  हूँ.

अब बारी मेरी थी दोस्ती निभाने की ....... और मैं एक बेहद महान दोस्त था..... अर्चित से भी ज्यादा.  खैर, ये सब तो हँसी मज़ाक की बातें थीं ...... वाकई में अर्चित एक अच्छा और सच्चा दोस्त था...... ऐसा नहीं की हमारी कभी लड़ाई नहीं हुई पर वो भी दोस्ती के रिश्ते की मजबूती के लिए अहम होती है. अर्चित और मैंने भूगोल के प्रैकटिकल में मीनाक्षी मंदिर का प्रोटोटाइप बनाया था .जिसकी वजह से हमें हमारे शिक्षकों की अनगिनत सराहना मिली......एक बार मैं अर्चित के घर गया था .....हमने तय किया था कि साथ में कोचिंग पढ़ने जाएंगे ..... समय की कमी होने के बावजूद अर्चित तुरंत मेरे लिये चाय लेकर आया ..... क्योंकि उसे यह मालूल था कि चाय मेरी सर्वाधिक प्रिय वस्तु है......मैंने मना भी किया पर जब तक मैंने चाय पी नहीं ली तब तक अर्चित इंतजार करता रहा .....खैर इस बीच वो शीशा देख बार-बार अपने बालों को Gel से सेट भी कर रहा था .....शायद अपनी फैंटेसि, अपनी गर्ल फ्रैंड को इमप्रेस करने के लिये......... ( मज़ाक कर रहा हूँ ).
दूसरों की छोटी- छोटी खुशियों का ध्यान रखने वाला , अपनी बात का पक्का , दिल का सच्चा , थोड़ा नट्खट , थोड़ा शरारती , ज़िंदगी के हर पल को ज़िंदादिली से जीने वाला ,मासूम चेहरे व सुंदर भूरी आँखों वाला, बेहद खुशमिजाज़ .......कुछ ऐसा ही है मेरा प्यारा दोस्त अर्चित मिश्रा.  


सुबह के चार बज गए हैं ......मैं, चाय का तीसरा प्याला समाप्त कर चुका हूँ .....नींद के कारण कीपैड पर गलत अक्षरों पर अंगुलियाँ पड़ रहीं है......अत: बेहतर यही होगा कि इस चिट्ठे को यहीं विराम दे दूँ . 



अंत में अपने दोस्त 'अर्चित' से यही कहूँगा कि :

रब से बस यही है दुआ मेरी,
कि तुम्हें मिले ज़िंदगी की हर खुशी ,
हर पल मुस्कुराये तुम पर ज़िंदगी,
तेरे हर रास्ते पर खुशियों की चादर बिछाये ये ज़िंदगी,
तुम हर पल बस हँसते रहो, अपने सपने सच करते रहो.
बस दोस्ती के इस लफ्ज़ को कभी तुम भूल ना जाओ,
इसलिये कृ्प्या कर, मेरा हर एक ब्लॉग सदा पढ़ते रहो.



आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :

                                                      - ऋषभ शुक्ल

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Comments

  1. good work...really awesome ...keep it up

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  2. & yes very interesting blog & well written as always

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  3. Rishab...awesome work..really appreciable...ULTIMATE..
    God bless u Dear...

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  4. wow....just woww...you are fabulous & know your stuff i,e painting & writing , very well ....great work ...
    -archana

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  5. awesomeee yrrr..... nice workkk.. :D

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    1. thanks dear reader ....plz keep visiting :-)
      plz do mention your name while choosing the profile Anonymous.
      thanks

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  6. one more wonderful piece of art ...rishabh arts rocks (Y)

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  7. ऋषभ जी !अत्यंत सराहनीय ...

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  8. dubara read kr rha hu isko
    sach me rishabh yaadein taaza krdi aapne vo school k din b kitne ache the or aapke sath bitae hue pal to humari khushkismati h

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