Saturday, 24 November 2012

GUEST POST : Home decor collection

Dear blog audience ..... here is a home decor collection by Miss 'Swapnil Shukla' ..The collection is really amazing .......friends are also invited to share their creative stuff through this blog...... Cheers !!!!!

 

 Home decor collection

 


Through this post ..I am going to throw light on ' home decor items ' of your signature style ..... I am sharing few pics of my collection of home decor range designed for my personal use which includes few handicrafts, candles, paintings, crochet , soft toys, matty work etc. 
Before we go ahead, first lets understand the meaning of few terms : 

Decor : the style of furniture, wallpaper, carpeting, curtains, and accessories chosen for a room or house 

Handicraft : object made by hand: something made using manual skill 

Crochet :  form of needlework used to make clothes or decorative items from wool or thick stiff thread, by looping it through itself with a special hooked needle crochet hook 


Home decor collection designed by Swapnil Shukla
{ for personal use } .

                           






































- Swapnil Shukla

{Posted by : Rishabh Shukla }


copyright©2012Rishabh Shukla.All rights reserved
No part of this publication may be reproduced , stored in a  retrieval system or transmitted , in any form or by any means, electronic, mechanical, photocopying, recording or otherwise, without the prior permission of the copyright owner. 

Copyright infringement is never intended, if I published some of your work, and you feel I didn't credited properly, or you want me to remove it, please let me know and I'll do it immediately.

Tuesday, 6 November 2012

दोस्ती के नाम : 05


 दोस्ती के नाम : 05

दोस्ती के नाम की पाँचवी  श्रृंखला में आप सभी का हार्दिक स्वागत है. आज यह चिट्ठा समर्पित कर रहा हूँ अपने प्रिय मित्र श्री ' उमेश पाल ' जी को.

" दोस्ती का जहाँ था, मोहब्बत की फिज़ा थी,
दुश्मनी क्या होती है , किसको पता थी.
हर तरफ पल- पल ज़िंदगी मुस्कुराती थी ,
मानो पुष्प बगिया में हर सुबह खिल उठते हों,
नज़र ही नज़र में  दोस्ती हो जाती थी,
एक ही पल में खुशियों की दुनिया बस जाती थी........."

 

स्वप्निल जी की कविता ' अपूर्वा ' की ये पंक्तियाँ मुझे अक्सर यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि सच में, हमारे बचपन में हमारी सोच कितनी पाक- साफ, निष्कपट, छल रहित , मासूमियत और भोलेपन से भरी होती है ...... ज़िंदगी की उस अवस्था { स्टेज } पर दुनिया बहुत खूबसूरत होती है व लगती है . ये तो मानव बुद्धि है कि जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है....... कहीं न कहीं , कभी न कभी भिन्न- भिन्न विकृ्तियाँ हमारे मन-मस्तिष्क में जगह बनाने लगती हैं और हमारी सोच पर  दुश्मनी, इर्ष्या, द्वेष , लालच, क्रोध, नीचता आदि विकार समा जाते हैं. परंतु ऐसे लोगों को आप क्या कहेंगे जो बाल्यावस्था से युवावस्था में आकर भी अपने भीतर मानवता, मधुरता, धैर्य,  संयम,  ईमानदारी, विनम्रता, बच्चों सी मासूमियत व भोलापन , सरलता व सिंप्लिसिटि जैसे सदगुणों को कायम रखने में सफल होते हैं और अपनी ज़िंदगी में सफलता के सर्वोच्च शिखर पर आसीन होते हैं. ......... नि:संदेह ऐसे लोग औरों की तुलना में अलग होते हैं व उन पर ईश्वर का साक्षात हाथ होता है.  और मैं , बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कहूँगा कि मेरा प्रिय दोस्त ' उमेश ' ठीक वैसा ही है जैसा कि मैंने उदाहरण प्रस्तुत किया .

सरल, विनम्र, मधुर, धैर्यवान, परिश्रमी, मासूम, ईमानदार व सहयोगी .......... यह चंद शब्द पूरे तो नहीं पड़ते उमेश की शख्सियत को बयां करने के लिये पर शायद उमेश के व्यक्तित्व को रेखांकित करने की क्षमता तो ये शब्द रखते ही हैं.



'उमेश ' से मेरी मुलाकात कक्षा 8 वीं में हुई थी { 8वीं- ' स ' } . उसके विनम्र व सहयोगी स्वभाव का मैं सदैव सम्मान करता हूँ. उमेश एक ऐसा युवक है जिसको मैंने पल- पल आगे बढ़ते देखा है.  यदि मैं कहूँ कि ' उमेश ' अपने आप में इस बात का साक्षात  उदाहरण है कि सही दिशा में कड़ा परिश्रम करने वाले, दूसरों के साथ अच्छाई करने वाले व दूसरों के लिये सकारात्मक भावना रखने वाले व्यक्ति ज़िंदगी में सदैव उच्च स्तरीय सम्मान व सुख - शांति प्राप्त करते हैं , तो यह किसी भी प्रकार से अतिशयोक्ति नहीं होगी.


8वीं कक्षा की ही बात है .......एक दिन मैंने उमेश से पूछा कि " तुम्हारा ambition क्या है? तुम भविष्य में किस field में जाना चाहोगे ?" ........ उमेश ने मुझे उत्तर दिया कि , " ऋषभ ! मेरा यह सपना है कि मैं इंजीनियर बनूँ और अपने माँ- बाप का नाम रौशन करुँ ." ............ और मुझे इस बात की बेहद प्रसन्नता है कि उमेश ने अपने सपनों को हकीकत में तबदील कर लिया है...... उमेश आज  पेशे से एक इंजीनियर है. उसने जो सपने देखे उन्हें अपने दम पर सच किये. उसने अपने आप से किया गया वादा निभाया ..... अपने लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त किया...... और मैं बिल्कुल भली- भाँति समझ सकता हूँ कि यह उमेश के साथ - साथ उसके माता- पिता के लिये भी बेहद गौरव का विषय होगा जब उनके बच्चे ने वो कर दिखाया जिसका सपना उसने बचपन से देखा था. ......
10वीं कक्षा के बाद उमेश ने विज्ञान संकाय चुना और मैंने वाणिज्य संकाय ..... अलग विषय व कक्षा होने के कारण हमारी बातचीत कम जरुर हो गयी थी पर हृ्दय में एक दूसरे के प्रति प्रेम व सम्मान परस्पर बना रहा. ' दोस्ती के नाम ' की 5वीं श्रृंखला में उमेश के साथ मेरी दोस्ती की यादों को ताजा कर मन हर्षोल्लास से भर उठा है....... मैं अपने प्रिय मित्र ' उमेश के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ और हमारी ये सच्ची दोस्ती जीवनपर्यंत बनी रहे , ईश्वर से बस यही कामना करता हूँ.




अंत में उमेश से यही कहना चाहूँगा कि :

ऎ दोस्त,
बहारों में बसर हो ज़िंदगानी आपकी ,
फूलों सी महके ज़िंदगानी आपकी ,
सूरज की तरह चमकते रहें आप ,
हर पल रौशन हो  दुनिया आपकी,
दुआ तो मेरी बस इतनी ही है कि
खुशियों की हर चाभी मुट्ठी में हो आपकी
बहारों में बसर हो ज़िंदगानी आपकी ,
फूलों सी महके ज़िंदगानी आपकी .


आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :


                                                      - ऋषभ शुक्ल

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Thursday, 1 November 2012

दोस्ती के नाम : 04


 दोस्ती के नाम : 04

दोस्ती के नाम की चौथी सिरीज़ ( श्रृंखला )  लिखते हुए बेहद प्रसन्नता का अहसास हो रहा है और हो भी क्यों न इसके जरिये चंद पलों के लिये ही सही पर् मैं उन खूबसूरत यादों व पुराने समय में वापस चला जाता हूँ जहाँ मेरी मुलाकात उन व्यक्तियों से हुई जो देखते ही देखते मेरे हृ्दय के करीब हो गए.  उनकी यादें मेरे लिये खास बन गई . और शायद उन लोगों के लिये भी दोस्ती की खट्टी- मीठी यादें उतनी ही खास है जितनी मेरी लिये हैं.
 

आज टाइम मशीन पर सवार होकर एक बार पुन: अपने स्कूल डेस में आ गया हूँ......................

11वीं कक्षा ...... वाणिज्य संकाय....... नया सत्र.........पहला दिन...... मैं विद्यालय के निश्चित समय से थोड़ा पहले ही विद्यालय में प्रवेश कर चुका था. 11वीं -  'ब' कक्षा से मेरी शिक्षा की नई शुरुआत होनी थी . नए दोस्त बनने थे . नई कहानियाँ बननी थीं व रचनी भी थीं.  कक्षा का ताला खुला था.  मैंने दरवाज़े को खोला ....... सन्नाटा ......हर ओर सन्नाटा छाया था..... घोर सन्नाटा और सन्नाटे को चीरती सनसनी दस्तक दे रही थी. .....वो भी मेरे रुप में. हा हा हा हा.........
 

कक्षा की दहलीज़ पर खड़े होकर खुद से शपथ ली कि खूब मेहनत से पढ़ूंगा .......जियूँगा और जीने दूँगा.....थोड़ा चुप रहूँगा ...शाँत रहूँगा किंतु तब तक, जब तक धैर्य कायम रहेगा ....यदि एक बार भी किसी के कारण भी मेरी मानसिकता खराब हुई तो उक्त व्यक्ति का जीना हराम करुँगा..... यह भी बढ़िया काम करुँगा बाकि समय कक्षा में थोड़ा आराम करुँगा.
कक्षा में प्रवेश करते  ही अपने लिये सीट चुनी और अन्य विद्यार्थियों के आने का इंतज़ार करने लगा. थोड़ी ही देर में बच्चे आना शुरु हुए. ज्यादा समय नहीं बीता था कि सामने से एक बेहद मासूम,  शक्ल से भोला- भाला , हिरण जैसी खूबसूरत आँखें और उन आँखों में निष्कपटता , श्वेत वर्ण .....मासूमियत के साक्षात उदाहरण के रुप में 'श्री अर्चित मिश्र जी' , अपने मित्र के साथ कक्षा में प्रवेश कर रहे थे. 'अर्चित' ने अपने लिये सीट चुनी..... अपना काला बैग सीट पर रखा...... गहरी साँस ली और फिर अपने दोस्त के साथ मेरी ओर बढ़ कर हाथ मिलाया.....उसने अपना परिचय दिया....अपने दोस्त का परिचय मुझसे कराया ......मैंने भी अपना परिचय दिया  और हमारी दोस्ती की शुरुआत हो गई.  मैं, अर्चित को समझने की कोशिश कर रहा था. मुझे लगता था कि अर्चित जैसे इतने मासूम युवक की कैसे बसर होगी चूंकि हमारे विद्यालय के वाणिज्य संकाय के बच्चे अमूमन थोड़े तेज- तर्रार होते थे. पर जब मैंने मिश्रा जी को थोड़ा और जाना समझा , उनकी बाते सुनीं तब मुझे अहसास हुआ कि अर्चित जी आखिर जीज़ क्या हैं..... उनकी शख्सियत को बयान करने के लिये ये चंद पंक्तियाँ ही काफी होंगी :

अब क्या करें उनकी अपनी जुबान से तारीफ ,
जिनकी सूरत तो है मासूमों की.
गर शख्सियत की बात करें उनकी ,
तो सिर्फ और सिर्फ याद आती हैं,
फितरते शातिरों की. 




जी हाँ,  वाकपटुता इनमें कूट - कूट के भरी थी. अर्चित जी से बात करते वक़्त आप को अपने दिमाग का बल्ब आन ( Bulb On ) करना आवश्यक होता था...... कुल मिलाकर अर्चित की बातचीत से ही उसकी बुद्धिमत्ता का अंदाज़ा लगाया जा सकता था...... तर्क शास्त्र में तो उन्होंने मानो हायर डिग्री ले रखीं थी. साहसी , हाज़िर- जवाब , खुशमिजाज़ , थोड़े हठी , सहयोगी व्यवहार वाले व निडर ऐसे थे मेरे यार 'श्री अर्चित मिश्रा जी' :)
ये तो हो गई अर्चित के व्यक्तित्व की बेसिक चर्चा..... आईये अपनी यादों के पिटारे से कुछ खास यादों को आप सभी के साथ ताजा करते हैं....... 
 

बात 11वीं कक्षा की है ..... भूगोल विषय के हमारे अध्यापक काफी सख़्त स्वभाव के थे ...... परंतु अर्चित को वो काफी पसंद करते थे...... उन्होंने अर्चित को शायद पिछली कक्षाओं में भी पढ़ाया था..... और अर्चित पढ़ाई में काफी होशियार भी था.  मैंने भी भूगोल विषय ले रखा था. हमें भूगोल विषय की पढ़ाई के लिये मानविकी संकाय की कक्षा में  जाना पड़ता था. मेरा उन अध्यापक से पहली बार सामना हो रहा था..... काफी सुना था उनके बारे में कि वो काफी सख़्त हैं ..... कक्षा शुरु हुई .... अर्चित के साथ मैं पहली सीट पे बैठा था ..... कक्षा शुरु होने के 15 मिनट बाद मुझे जोर की नींद आने लगी ..... जैसे ही सर् जी ब्लैक- बोर्ड पर लिखने को होते मैं एक झीम ले लेता ...... अर्चित ने जैसे ही मुझे नींद के मज़े लेते देखा, उसने मुझे जोर से झकजोर दिया .... बड़ा क्रोध आया अर्चित पर .... अर्चित ने धीरे से मुझे चेतावनी दी कि, " ऋषभ ! अपनी हरकतो को विराम दो ..... इस कक्षा में तुम नींद का आनंद नहीं उठा पाओगे ......ये सर कड़क मिजाज़ के हैं " ........ मैंने अर्चित से धीरे से कहा कि, "अरे ! जब तक वो ब्लैक- बोर्ड पर लिख रहे हैं तब तक ही तो थोड़ी सी नींद का आनंद् ले रहा हूँ.....तुम तो जग रहे हो जैसे ही सर लिखना बंद करें तुम मुझे इशारा कर देना" ...... अर्चित ने मुझे आश्वासन दिया कि,"ठीक है, मेरे दोस्त मैं हूँ ना !" ....और अगले ही पल मुझमें कुंभकरण् की आत्मा समा गयी. और मैं सो गया ....... कोई अवरोध नहीं पड़ रहा था मेरी नींद में ..... कितना समय बीत गया मुझे पता नहीं चला ..... अचानक मुझे बड़ी तेज Negative Vibrations feel होने लगीं....जब नींद खुली तो देखा कि सर जी अपनी टेबल पर बैठ एकटक मुझे घूर रहे थे ...... उनकी घूरती आँखों को देख मैंने तुरंत अर्चित को घूरा और अर्चित मंद- मंद मुस्कान के साथ एक अच्छे - बच्चे की तरह ब्लैक बोर्ड में लिखी चीज़े अपनी कॉपी पर उतार रहा था..... मैं समझ चुका था कि अर्चित ने अपनी दोस्ती निभा दी और अब इस मुसीबत में मुझे डाल कर जीवन भर के लिये मुझे सबक सिखा दिया कि कक्षा में कभी भी सोना नहीं चाहिये.  यही एक सच्चे दोस्त की निशनी होती है ......खैर , हम भी कुछ कम नहीं थे ..... हमने भी अर्चित से ज्यादा मासूम चेहरा बनाया और सर से बड़ी ही विनम्रता से कहा ..... "माफ कीजियेगा सर ! पता नहीं कैसे आँख लग गयी ...सुबह से बुखार मह्सूस हो रहा है ... आपकी अनुमति हो तो मैं मुँह धुल लूँ ताकि नींद के साथ अपनी गलती को भी धो सकूँ ".... सर जी मेरा चेहरा देख कर रह गए .......उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा. और अपनी नज़रें फेर ली और उनकी नज़रे फेरते ही मेरी नजरें अटक गईं अर्चित पर .........
खैर , अपने सर के बड़प्पन का मैं , सम्मान करता हूँ कि उस दिन के मेरे बचपने को उन्होंने नज़रअंदाज़ कर दिया ......चूंकि उन्हें भी पता था कि असल में मैं भी हूँ तो एक शिष्ट और होशियार छात्र ही बस थोड़ा शैतान जरुर  हूँ.

अब बारी मेरी थी दोस्ती निभाने की ....... और मैं एक बेहद महान दोस्त था..... अर्चित से भी ज्यादा.  खैर, ये सब तो हँसी मज़ाक की बातें थीं ...... वाकई में अर्चित एक अच्छा और सच्चा दोस्त था...... ऐसा नहीं की हमारी कभी लड़ाई नहीं हुई पर वो भी दोस्ती के रिश्ते की मजबूती के लिए अहम होती है. अर्चित और मैंने भूगोल के प्रैकटिकल में मीनाक्षी मंदिर का प्रोटोटाइप बनाया था .जिसकी वजह से हमें हमारे शिक्षकों की अनगिनत सराहना मिली......एक बार मैं अर्चित के घर गया था .....हमने तय किया था कि साथ में कोचिंग पढ़ने जाएंगे ..... समय की कमी होने के बावजूद अर्चित तुरंत मेरे लिये चाय लेकर आया ..... क्योंकि उसे यह मालूल था कि चाय मेरी सर्वाधिक प्रिय वस्तु है......मैंने मना भी किया पर जब तक मैंने चाय पी नहीं ली तब तक अर्चित इंतजार करता रहा .....खैर इस बीच वो शीशा देख बार-बार अपने बालों को Gel से सेट भी कर रहा था .....शायद अपनी फैंटेसि, अपनी गर्ल फ्रैंड को इमप्रेस करने के लिये......... ( मज़ाक कर रहा हूँ ).
दूसरों की छोटी- छोटी खुशियों का ध्यान रखने वाला , अपनी बात का पक्का , दिल का सच्चा , थोड़ा नट्खट , थोड़ा शरारती , ज़िंदगी के हर पल को ज़िंदादिली से जीने वाला ,मासूम चेहरे व सुंदर भूरी आँखों वाला, बेहद खुशमिजाज़ .......कुछ ऐसा ही है मेरा प्यारा दोस्त अर्चित मिश्रा.  


सुबह के चार बज गए हैं ......मैं, चाय का तीसरा प्याला समाप्त कर चुका हूँ .....नींद के कारण कीपैड पर गलत अक्षरों पर अंगुलियाँ पड़ रहीं है......अत: बेहतर यही होगा कि इस चिट्ठे को यहीं विराम दे दूँ . 



अंत में अपने दोस्त 'अर्चित' से यही कहूँगा कि :

रब से बस यही है दुआ मेरी,
कि तुम्हें मिले ज़िंदगी की हर खुशी ,
हर पल मुस्कुराये तुम पर ज़िंदगी,
तेरे हर रास्ते पर खुशियों की चादर बिछाये ये ज़िंदगी,
तुम हर पल बस हँसते रहो, अपने सपने सच करते रहो.
बस दोस्ती के इस लफ्ज़ को कभी तुम भूल ना जाओ,
इसलिये कृ्प्या कर, मेरा हर एक ब्लॉग सदा पढ़ते रहो.



आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :

                                                      - ऋषभ शुक्ल

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