दोस्ती के नाम :

























दोस्ती,
कहो तो दो लफ्ज़, मानो तो बंदगी
सोचो तो गहरा सागर, डूबो तो ज़िंदगी
करो तो आसान, निभाओ तो मुश्किल
बिखरे तो ज़माना , सिमटे तो सिर्फ तुम



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च में, दोस्ती एक बेहद रोचक , अटूट व अनमोल रिश्ता होता है ..... दोस्ती तब और भी अनमोल बन जाती है जब आपके दोस्त बचपन से आपके साथ हों ......साथ- साथ पढ़ना- बढ़ना, खेलना- कूदना , हँसी मज़ाक , एक दूसरे को समझना , मदद करना, एक दूसरे की भावनाओं का आदर करना व सुख - दुख में साथ रहना .....और जीवन पर्यंत साथ निभाना... यही कुछ वाक्य दोस्ती के रिश्ते को परिभाषित करते हैं.
आज अपने चिट्ठे की इस पोस्ट को अपने प्रिय मित्रों में से एक 'अनीश द्विवेदी' के नाम कर रहा हूँ.

'अनीश द्विवेदी' - सरल, मासूमियत से भरपूर व गंभीर व्यक्तित्व का धनी , श्याम वर्ण , आँखों में समुद्र सी गहराई व अनेकों सपने .....यही है अनीश की पह्चान .
अनीश से मेरी मुलाकात मेरे विद्यालय में 11 वीं कक्षा में हुई ... हालांकि हम इससे पूर्व भी एक ही कक्षा में थे परंतु उसका सेक्शन अलग था...  दसवीं के बाद हम 11वीं कक्षा, वाणिज्य संकाय के साथ अपनी शिक्षा की एक नई शुरुआत कर रहे थे..... सत्र की शुरुआत में ही मुझे मॉनिटर बना दिया गया ......
जब कुछ अध्यापक क्लासेस लेने में अक्षम होते थे तब ऐसे में कक्षा को संभालने की ज़िम्मेदारी मेरी होती थी, जब तक अध्यापक कक्षा में आ न जाएं...  खैर , मेरे कक्षा के सभी सहपाठी काफी संवेदनशील हुआ करते थे .....तभी उन्हें शांत रखने के लिये मुझे अधिक जद्दोज़ेहद नहीं करनी पड़्ती थी ...बस चॉक उठाई और जिसकी आवाज़ कानों में आई उसका नाम सीधे मेरे द्वारा बेहद स्टाइलिश अक्षरों में ब्लैक - बोर्ड में आ जाता था.... जो तब तक न बिगड़ता था जब तक संबंधित विषय के अध्यापक कक्षा में आ न जाएं ....हालांकि सहपाठियों को तीन वार्निंग देने के बाद ही मैं उन पर ऐसा अत्याचार करता था.....पहली 2 बार में नाम बिगाड़ देता था परंतु फिर भी यदि वो बंदा या बंदी शरारत करता या करती तो बस उस शरारत करने वाले का नाम ब्लैक बोर्ड की शोभा बढ़ा रहा होता था ..... परंतु एक नाम जो ब्लैक बोर्ड पर कभी नही आया वो नाम था अनीश का .....बल्कि जब भी मैं किसी का नाम बोर्ड पर लिखता तो अक्सर अनीश मुझे  और फिर बोर्ड को बड़े ध्यान से देखता .... मैं काफी दिनों से यह नोटिस कर रहा था ...एक दिन बड़े ही खीजते हुए मैंने अनीश से पूछा कि, "क्या बात है ऐसे क्या देख रहे हो" ... अनीश ने मुस्कराते हुए कहा, "यार तुम्हारा लिखा हुआ एक- एक अक्षर बहुत सुंदर है मतलब तुम्हारी हैंड राइटिंग बेहद सराहनीय है".......  और मेरा क्या था मैं तो अपनी प्रशंसा सुन भीतर ही भीतर गद- गद हो गया परंतु उस वक़्त मॉनिटर के रुप में अपने सख्त मिज़ाज से बाहर नहीं आ सकता था...लेकिन उस दिन मैं समझ गया कि इस बंदे को सामने वाले की कला की कद्र है ... और जो कला की कद्र करता है ,मैं उसकी हमेशा से ही प्रशंसा करता हूँ.

धीरे- धीरे हमारी दोस्ती बढ़ी .... अनीश का स्वभाव  बेहद सरल , सिंपल , सहयोगी व  विनम्र है.......  जब मैं किसी दिन विद्यालय में अनुपस्थित होता और अगले दिन विद्यालय जाता तो सबसे पहले अनीश ही मुझे मेरी अनुपस्थिति में क्या -क्या हुआ ......मेरा मतलब है कि क्या- क्या पढ़ाया गया उसकी पूरी जानकारी बड़े ही धैर्य से बताता ......

अनीश की जन्मतिथि है 04-08-1989 और् मेरी है 03-08-1989 .. ऐसे में मैं अक्सर अनीश को इस बात के लिये irritate करने की कोशिश करता था कि तुम्हें मुझे 'भइया' कहना पड़ेगा क्योंकि मैं तुमसे एक दिन बड़ा हूँ .......मुझे लगता था मेरी इस बेतुकी सी बात से वो irritate हो जाएगा .......पर वो झट् से मुझे भइया कह देता . उसके इस कूल रवैये से मैं ही irritate हो जाता था ....
अनीश अक्सर कहता था कि, "ऋषभ ! यार यू आर रियली अ मैन आफ स्टाइल " ....खैर, मैं था भी........हम लोग अक्सर विद्यालय में होने वाले नाट्कों में भाग लेते...  हमारे विद्यालय में हुए एक नाट्क में अनीश 'यमराज' बना था ...नाट्क के अंत में उसका संवाद थोड़ा सा बोल्ड था ..... और यहाँ भी अनीश ने अपने खुराफाती दिमाग का इस्तेमाल कर स्टेज पर ही संवाद  बदल दिया .......सीन कुछ ऐसा था कि यमराज एक मानव की बात इस शर्त पर मानने को तैयार थे जब वो मानव वो वाक्य लिख दे जो यमराज उसे लिखने को कह रहे हैं ... और वो वाक्य था " गाय { पुचकारने की ध्वनी जिसे लिखा नहीं जा सकता है पर सुनने में थोड़ा अट्पटा लगता है } ...... अनीश ने वाक्य को बदल कर बना दिया " गाय हुर्र् र र र र " .......खैर नाट्क का अंत वैसे ही हुआ जैसा हम सब चाहते थे और हम सभी को दर्शकों व शिक्षकों की सराहना भी मिली ...पर अनीश को  स्टेज पर संवाद बदलने  के लिये अपने साथियों की नाराज़गी का सामना करना पड़ा ... .. हा हा हा हा हा.... यहाँ मैं ये भी लिख ही देता हूँ कि सबसे ज्यादा मेरी नाराज़गी का .......इस पर अनीश का तर्क था ....कि, "प्रिंसपल अगर निश्चित संवाद को सुन हम सभी को डाँटने लग जाते तो सबके सामने हमारी बेइज्जती ना होती और चूँकि संवाद मेरा { अनीश } था तो सबसे ज्यादा प्रिंसपल के कोप का शिकार मैं { अनीश } ही बनता " ..... ........
और मेरा तर्क था कि, "संवाद बदलने से उसका क्लाइमैक्स ही बदल गया क्योंकि  पुचकारने की वो ध्वनी  जो पहले से ही निश्चित थी , भले ही सुनने में अट्पटी लगे और प्रिंसपल की डाँट भी खिलाये पर उसे लिखा नहीं जा सकता इसके विपरीत तुम्हारे द्वारा संशोधित संवाद " हु र्र् र र र "   को आसानी से लिखा जा सकता है" ........
खैर, हम दोनों ये बहस कर ही रहे थे कि हमारा एक सीनियर आया और उसने हमारे काम की इतनी सराहना कर डाली जितनी हम दोनों को ही सुनने की आदत नहीं थी ..तो बस अपनी बहस भूल हम  दोनों दोस्त और हमारे अन्य साथी चल निकले कैंटीन की ओर सेलिब्रेशन करने .........

देखते ही देखते अनीश भी मेरे उन शीर्ष दोस्तों की लिस्ट में शामिल हो गया जो मेरे हृ्दय के करीब हैं..... मुझे उनका तो नहीं पता कि जिन्हें मैं दोस्त मानता हूँ ...उनका नज़रिया मेरे लिये कैसा है पर मेरे लिये मेरे विद्यालय के समय के कुछ साथी मेरे लिये बहुत खास हैं और इसी कारण आज भी उन चंद  लोगों से जुड़ा हूँ .....भविष्य में भी जुड़ा रहना चाहूँगा......... बाकी मैं इस सच से भी भली भाँति परिचित हूँ कि दोस्ती करना तो आसान है पर निभाना बेहद मुश्किल ................

अभी फेस बुक की कृ्पा से अनीश के साथ- साथ अन्य प्रिय दोस्तों  से काफी सालों बाद पुन: बातचीत हुई ...हम सभी ने ज़िंदगी में बहुत हद तक वो पा लिया जिसकी हमें चाह थी. कहीं ना कहीं मेरे सभी प्रिय दोस्त जो मेरे करीबी हैं वो सब खुश हैं बाकी संघर्ष तो जीवन का हिस्सा है..........
अनीश ने ब्लॉगर पर मुझे ज्वाइन कर रखा है ... कला प्रेमी अनीश ने एक दिन मेरे ब्लॉग पर Art of Portraiture पढा़ और उसने इच्छा ज़ाहिर की क्या मैं उसका एक Portrait बना सकता हूँ ...पहले तो मुझे उसकी बात मज़ाक लगी ..पर जब मुझे लगा की वो सीरियस है तो अपने दोस्त की बात को टाल दे , ये ' ऋषभ ' की फितरत नहीं.........

अनीश ने तुरंत मुझे अपनी फोटो भेजी .........फिर क्या था .... अरे जनाब ! समय मिलता नहीं ... ...समय निकालना पड़ता है .... खुशियाँ पानी है गर .......तो किया हुआ वायदा निभाना पड़ता है .......तो उसी वायदे को निभाते हुए ...कुछ पुरानी यादों को ताजा करते हुए ...बरसात के मौसम में गर्म चाय की चुसकियों के साथ इन Portraits  को तैयार किया ..... और जब पुरानी यादें ज़ेहन में आ ही गईं तब क्या था एक और चाय की प्याली के साथ इस चिट्ठे को भी उसी वक़्त तैयार कर डाला ..........

दोस्ती के अब तक के इस खूबसूरत सफर को आप सबके साथ ना बाँटता तो यह बेईमानी होती ..........तो लीजिये पेश है दोस्ती के नाम एक प्यार भरा जाम :

 







आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :

                                                      - ऋषभ शुक्ल
 

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Comments

  1. Thanks Dear.

    Very Good pics i showed them in my Office and every body is appreciating your effort nice very nice.

    And I also still remember the incidents you have mentioned. You are still Dashing and Fashionable and the same is reflecting in your profession and I wana tell everyone here that you taught me to draw a girls portrait and still remember that Shortcut methods.


    Friends he warned me joine a group which was afraid of Increasing Competition in studies and asked not to join because nobody want you wiyh them.

    I let that group to HAPPY and went away in another one.

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  2. wowwww......greatttttttttt wrk i must say rishabh ...... bilkul same to same hai ji :-)

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    1. thanks for your encouragement ...its very inspiring ..keep visiting & writing your precious comments

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  3. & yes a very well written article :-D... congr8.....

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  4. omg.....arre rishabh bhai ...hum par bhi kabhi kripa kar diyaa karein ..... humaari shakal pasand nahi kyaa aapko ya hum aapki friend list main hi nahi ......... sach main dil dukhaa diyaa .... jealous with the guy jinke portrait par aapki art : THE RISHABH'S ART ' kaa magic chal gayaa ...

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    1. gurpreet : thanks dear .....aisa kuch nahi hai yaar ...even u r on the top of my friends list ....i will try to make ur portrait as soon as possible......thanks once again :-)

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  5. a very well written article ..... & nice portraits...well done

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