दोस्ती के नाम -2




 दोस्ती के नाम -2

र किसी की ज़िंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं  जो लगभग हम सभी के लिये खास होते हैं .जिनमें से स्कूल डेस की यादें अक्सर हम सभी को अपनी ज़िंदगी के कुछ हसीन पलों की याद दिला देती हैं. मैं कहूँगा कि स्कूल डेस के दौरान मेरे अनुभव दिल में कचोटन पैदा करने वाले थे. पर जैसे की हम सभी जानते हैं कि एक सिक्के के दो पहलू होते हैं , वैसे ही यदि मेरे स्कूल डेस में अधिकतर कड़वी यादें हैं तो कुछ ऐसी भी यादों की बहार है जो कड़वी यादों पर भारी हैं . और इन मीठी  यादों का कारण वे चंद लोग हैं जो मेरे दोस्त हैं , जो उस वक़्त भी मेरे साथ थे और आज भी मेरे साथ हैं... शायद उन्हीं के कारण मुझे अपने स्कूल डेस से पूर्णतया घृ्णा नहीं हुई क्योंकि जहाँ कभी कड़वी यादों की काली रात मन-मस्तिष्क में कड़वाहट भरती है तो वहीं दोस्तों के साथ बिताये कुछ खास पल मन -मस्तिष्क में समुज्जवलता प्रदान करते हैं.

सीधे शब्दों में कहूँ तो मेरे स्कूल डेस में चंद ही सहपाठी ऐसे थे जो मेरे दोस्त बन सके. अर्थात मेरे क्लासमेट्स से मेरे फ्रेंड्स बनने तक के सफर को चंद शख्सियतों ने ही पार किया है जो आज भी मेरे हृ्दय के करीब हैं और हमेशा रहेंगे .....उन चंद शख्सियतों में 'पनम' भी एक है.

'पनम' - बेपनाह खूबसूरती की मिसाल , संगेमरमर की मूर्ति सा रुप- सौंदर्य , नदी की भाँति चंचल , खुशमिजाज़ अपितु तुनकमिजाज़ भी, सुरम्य काया, विनम्र स्वभाव , सीधी -सपाट बात करने वाली , थोड़ी हठी , तेज गति से चलने वाली , निडर व साहसी .... ऐसी थी मेरी दोस्त व मेरी मुँहबोली प्यारी बहना ' पनम चोपड़ा'.

पनम से मेरी मुलाकात 11वीं कक्षा , वाणिज्य संकाय में हुई . हमारी ज्यादा बातचीत नहीं होती थी परंतु एक दूसरे के प्रति परस्पर सम्मान की भावना थी. पनम  पढ़ाई में काफी होशियार थी और थोड़ा Reserved  Nature की थी.

अब इसे मैं दुर्भाग्य कहूँ या बेहद हास्यास्पद वाक्या कि हमारी पहली मुख्य बातचीत ही झगड़े के रुप में हुई थी ..... मुझे आज भी याद है कि उस दिन पेरेन्ट्स मीटिंग थी और पनम की फैमिली से उसकी दीदी मीटिंग में उपस्थित थीं . दीदी के बातचीत का ढंग बहुत सुंदर था ....... खैर वे थीं भी बहुत सुंदर ....... अब मैं, ठहरा कलाकार .....सौंदर्य के पीछे हर कलाकार आकर्षित हुए बिना तो रह नहीं पाता  तो मैंने पनम से पूछा कि, "तुम्हारी मम्मी नहीं आईं ... और ...ये कौन हैं ?".......... कक्षा में बहुत अधिक शोर हो रहा था जिसके कारण पनम को शायद आधी बात सुनाई दी और एकाएक पनम जी की भृ्कुटि ( भौंहें ) तन गईं.... उनका सफेद संगेमरमर चेहरा क्रोध के कारण लाल हो गया और बड़े ही किचकिचाते हुए पनम ने मुझसे कहा कि, " ऋषभ ! ये तुम्हें मेरी मम्मी लग रहीं हैं ..... ये मेरी बड़ी दीदी हैं ..... "
मैं तुरंत समझ गया कि शायद मेरा प्रश्न पनम के कानों तक उचित तरीके से नहीं पहुँचा . पर पनम के इस क्रोधित रुप को देख मुझे बड़ी हँसी आई .....और मेरे मुख पर हँसी देख पनम ने अपना मुँह आगे फेर लिया जैसे मन ही मन मुझे कोस रही हो कि ," बेशर्म कहीं का ..!" .

खैर आई गई बात खत्म हो गई .........पनम की एक बात अच्छी थी कि वो ज्यादा किसी बात को घसीटती नहीं थी ... बेहद साफ- सुथरे हृ्दय की थी वो .....जो कहना है , मुँह पर कहना है ....किसी के लिये भी उसके दिल में कोई छल - कपट या बैर भाव नहीं था. हमारे विद्यालय के Prefect के रुप में पनम की भूमिका व नेतृ्त्व क्षमता सराहनीय व काबिले तारीफ थी .

फेसबुक की कृ्पा से आज भी जब अपने उन चंद दोस्तों से संपर्क होता है तो पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं .एक सच्चे दोस्त की भाँति ही पनम मेरे कार्य, कला व लेखनी की प्रशंसक है और लगभग मेरे हर नए कार्य में उसकी शुभकामनायें व बधाईयाँ मेरा हौसला बढ़ाती रहती हैं ...... यही एक सच्चे दोस्त की पहचान होती है और मुझ पर ईश्वर की बड़ी अनुकम्पा है कि मुझे ऐसे सच्चे दोस्त मिले जो आज भी मेरे साथ हैं ... अभी कुछ समय पूर्व ' दोस्ती के नाम -1'  नामक पोस्ट में अपने दोस्त ' अनीश द्विवेदी' के Portraits के साथ कुछ पुरानी यादें अपने ब्लॉग पर अपडेट की थीं ........ पनम इस बात पर काफी नाराज़ हुई थी ....होना भी जायज़ है आखिर पनम के साथ दोहरा रिश्ता जो है - बहन का और दोस्त का ....तब इस शर्त के साथ कि पनम की नाराज़गी मुझसे तव खत्म होगी जब मैं उसके लिये कुछ लिखूँ...... और जब तक मैंने इसके लिये हाँ नहीं कही, पनम का गुस्सा शांत नहीं हुआ.

काफी दिनों तक सोचता रहा कि ' पनम ' की शख्सियत को शब्द रुपी मोतियों में कैसे पिरोऊँ ? इस कश्मकश में काफी समय बीत गया .......फिर थोड़ा कार्य का बोझ सिर पर आ गिरा जिसके चलते इस चिट्ठे को तैयार करने में काफी समय लग गया ........

पता नहीं इस चिट्ठे के माध्यम से पनम के जरिये दोस्ती के अनमोल व पवित्र रिश्ते को आप सबके कितना निकट ला पाया हूँ और पनम के व्यक्तित्व विश्लेषण में न्याय कर पाया हूँ या नहीं ....यदि ' नहीं' तो ये मेरी लेखनी की दुर्बलता व अभिव्यक्ति के दोषों के कारण हो सकता है ......परंतु पनम का ' भाई साहब ' होने के नाते हम तो अपनी बहना से यही कहेंगे कि," पनम ! तुमको दुनिया की हर खुशी मिले ...तुमको एक अच्छा सा जीवन साथी मिले जिसके सिर चढ़ जीवन पर्यंत तुम राज करती रहो... हा हा हा हा.....

वैसे हँसी मज़ाक से परे हम तो बस यही दुआ करेंगे कि :

आप जहाँ भी रहो , मुस्कुराते रहो
               हर महफिल हँसी से सजाते रहो.


आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों के इंतजार के साथ , आपका :

                   - ऋषभ शुक्ल 



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Comments

  1. kudos ....kudos ....& kudos rishabh......amazing work & xcellent use of words ....really u r a prince of words & art .......your friends are really lucky to get such a true friend like none other than : mr .RISHABH SHUKLA :-)

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  2. awesome dude......great article ....nice presentation ....simply pERFECT..

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  3. awesome post......keep blogging dear

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