Wednesday, 26 September 2012

दोस्ती के नाम -2




 दोस्ती के नाम -2

र किसी की ज़िंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं  जो लगभग हम सभी के लिये खास होते हैं .जिनमें से स्कूल डेस की यादें अक्सर हम सभी को अपनी ज़िंदगी के कुछ हसीन पलों की याद दिला देती हैं. मैं कहूँगा कि स्कूल डेस के दौरान मेरे अनुभव दिल में कचोटन पैदा करने वाले थे. पर जैसे की हम सभी जानते हैं कि एक सिक्के के दो पहलू होते हैं , वैसे ही यदि मेरे स्कूल डेस में अधिकतर कड़वी यादें हैं तो कुछ ऐसी भी यादों की बहार है जो कड़वी यादों पर भारी हैं . और इन मीठी  यादों का कारण वे चंद लोग हैं जो मेरे दोस्त हैं , जो उस वक़्त भी मेरे साथ थे और आज भी मेरे साथ हैं... शायद उन्हीं के कारण मुझे अपने स्कूल डेस से पूर्णतया घृ्णा नहीं हुई क्योंकि जहाँ कभी कड़वी यादों की काली रात मन-मस्तिष्क में कड़वाहट भरती है तो वहीं दोस्तों के साथ बिताये कुछ खास पल मन -मस्तिष्क में समुज्जवलता प्रदान करते हैं.

सीधे शब्दों में कहूँ तो मेरे स्कूल डेस में चंद ही सहपाठी ऐसे थे जो मेरे दोस्त बन सके. अर्थात मेरे क्लासमेट्स से मेरे फ्रेंड्स बनने तक के सफर को चंद शख्सियतों ने ही पार किया है जो आज भी मेरे हृ्दय के करीब हैं और हमेशा रहेंगे .....उन चंद शख्सियतों में 'पनम' भी एक है.

'पनम' - बेपनाह खूबसूरती की मिसाल , संगेमरमर की मूर्ति सा रुप- सौंदर्य , नदी की भाँति चंचल , खुशमिजाज़ अपितु तुनकमिजाज़ भी, सुरम्य काया, विनम्र स्वभाव , सीधी -सपाट बात करने वाली , थोड़ी हठी , तेज गति से चलने वाली , निडर व साहसी .... ऐसी थी मेरी दोस्त व मेरी मुँहबोली प्यारी बहना ' पनम चोपड़ा'.

पनम से मेरी मुलाकात 11वीं कक्षा , वाणिज्य संकाय में हुई . हमारी ज्यादा बातचीत नहीं होती थी परंतु एक दूसरे के प्रति परस्पर सम्मान की भावना थी. पनम  पढ़ाई में काफी होशियार थी और थोड़ा Reserved  Nature की थी.

अब इसे मैं दुर्भाग्य कहूँ या बेहद हास्यास्पद वाक्या कि हमारी पहली मुख्य बातचीत ही झगड़े के रुप में हुई थी ..... मुझे आज भी याद है कि उस दिन पेरेन्ट्स मीटिंग थी और पनम की फैमिली से उसकी दीदी मीटिंग में उपस्थित थीं . दीदी के बातचीत का ढंग बहुत सुंदर था ....... खैर वे थीं भी बहुत सुंदर ....... अब मैं, ठहरा कलाकार .....सौंदर्य के पीछे हर कलाकार आकर्षित हुए बिना तो रह नहीं पाता  तो मैंने पनम से पूछा कि, "तुम्हारी मम्मी नहीं आईं ... और ...ये कौन हैं ?".......... कक्षा में बहुत अधिक शोर हो रहा था जिसके कारण पनम को शायद आधी बात सुनाई दी और एकाएक पनम जी की भृ्कुटि ( भौंहें ) तन गईं.... उनका सफेद संगेमरमर चेहरा क्रोध के कारण लाल हो गया और बड़े ही किचकिचाते हुए पनम ने मुझसे कहा कि, " ऋषभ ! ये तुम्हें मेरी मम्मी लग रहीं हैं ..... ये मेरी बड़ी दीदी हैं ..... "
मैं तुरंत समझ गया कि शायद मेरा प्रश्न पनम के कानों तक उचित तरीके से नहीं पहुँचा . पर पनम के इस क्रोधित रुप को देख मुझे बड़ी हँसी आई .....और मेरे मुख पर हँसी देख पनम ने अपना मुँह आगे फेर लिया जैसे मन ही मन मुझे कोस रही हो कि ," बेशर्म कहीं का ..!" .

खैर आई गई बात खत्म हो गई .........पनम की एक बात अच्छी थी कि वो ज्यादा किसी बात को घसीटती नहीं थी ... बेहद साफ- सुथरे हृ्दय की थी वो .....जो कहना है , मुँह पर कहना है ....किसी के लिये भी उसके दिल में कोई छल - कपट या बैर भाव नहीं था. हमारे विद्यालय के Prefect के रुप में पनम की भूमिका व नेतृ्त्व क्षमता सराहनीय व काबिले तारीफ थी .

फेसबुक की कृ्पा से आज भी जब अपने उन चंद दोस्तों से संपर्क होता है तो पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं .एक सच्चे दोस्त की भाँति ही पनम मेरे कार्य, कला व लेखनी की प्रशंसक है और लगभग मेरे हर नए कार्य में उसकी शुभकामनायें व बधाईयाँ मेरा हौसला बढ़ाती रहती हैं ...... यही एक सच्चे दोस्त की पहचान होती है और मुझ पर ईश्वर की बड़ी अनुकम्पा है कि मुझे ऐसे सच्चे दोस्त मिले जो आज भी मेरे साथ हैं ... अभी कुछ समय पूर्व ' दोस्ती के नाम -1'  नामक पोस्ट में अपने दोस्त ' अनीश द्विवेदी' के Portraits के साथ कुछ पुरानी यादें अपने ब्लॉग पर अपडेट की थीं ........ पनम इस बात पर काफी नाराज़ हुई थी ....होना भी जायज़ है आखिर पनम के साथ दोहरा रिश्ता जो है - बहन का और दोस्त का ....तब इस शर्त के साथ कि पनम की नाराज़गी मुझसे तव खत्म होगी जब मैं उसके लिये कुछ लिखूँ...... और जब तक मैंने इसके लिये हाँ नहीं कही, पनम का गुस्सा शांत नहीं हुआ.

काफी दिनों तक सोचता रहा कि ' पनम ' की शख्सियत को शब्द रुपी मोतियों में कैसे पिरोऊँ ? इस कश्मकश में काफी समय बीत गया .......फिर थोड़ा कार्य का बोझ सिर पर आ गिरा जिसके चलते इस चिट्ठे को तैयार करने में काफी समय लग गया ........

पता नहीं इस चिट्ठे के माध्यम से पनम के जरिये दोस्ती के अनमोल व पवित्र रिश्ते को आप सबके कितना निकट ला पाया हूँ और पनम के व्यक्तित्व विश्लेषण में न्याय कर पाया हूँ या नहीं ....यदि ' नहीं' तो ये मेरी लेखनी की दुर्बलता व अभिव्यक्ति के दोषों के कारण हो सकता है ......परंतु पनम का ' भाई साहब ' होने के नाते हम तो अपनी बहना से यही कहेंगे कि," पनम ! तुमको दुनिया की हर खुशी मिले ...तुमको एक अच्छा सा जीवन साथी मिले जिसके सिर चढ़ जीवन पर्यंत तुम राज करती रहो... हा हा हा हा.....

वैसे हँसी मज़ाक से परे हम तो बस यही दुआ करेंगे कि :

आप जहाँ भी रहो , मुस्कुराते रहो
               हर महफिल हँसी से सजाते रहो.


आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों के इंतजार के साथ , आपका :

                   - ऋषभ शुक्ल 



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Tuesday, 11 September 2012

दोस्ती के नाम :

























दोस्ती,
कहो तो दो लफ्ज़, मानो तो बंदगी
सोचो तो गहरा सागर, डूबो तो ज़िंदगी
करो तो आसान, निभाओ तो मुश्किल
बिखरे तो ज़माना , सिमटे तो सिर्फ तुम



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च में, दोस्ती एक बेहद रोचक , अटूट व अनमोल रिश्ता होता है ..... दोस्ती तब और भी अनमोल बन जाती है जब आपके दोस्त बचपन से आपके साथ हों ......साथ- साथ पढ़ना- बढ़ना, खेलना- कूदना , हँसी मज़ाक , एक दूसरे को समझना , मदद करना, एक दूसरे की भावनाओं का आदर करना व सुख - दुख में साथ रहना .....और जीवन पर्यंत साथ निभाना... यही कुछ वाक्य दोस्ती के रिश्ते को परिभाषित करते हैं.
आज अपने चिट्ठे की इस पोस्ट को अपने प्रिय मित्रों में से एक 'अनीश द्विवेदी' के नाम कर रहा हूँ.

'अनीश द्विवेदी' - सरल, मासूमियत से भरपूर व गंभीर व्यक्तित्व का धनी , श्याम वर्ण , आँखों में समुद्र सी गहराई व अनेकों सपने .....यही है अनीश की पह्चान .
अनीश से मेरी मुलाकात मेरे विद्यालय में 11 वीं कक्षा में हुई ... हालांकि हम इससे पूर्व भी एक ही कक्षा में थे परंतु उसका सेक्शन अलग था...  दसवीं के बाद हम 11वीं कक्षा, वाणिज्य संकाय के साथ अपनी शिक्षा की एक नई शुरुआत कर रहे थे..... सत्र की शुरुआत में ही मुझे मॉनिटर बना दिया गया ......
जब कुछ अध्यापक क्लासेस लेने में अक्षम होते थे तब ऐसे में कक्षा को संभालने की ज़िम्मेदारी मेरी होती थी, जब तक अध्यापक कक्षा में आ न जाएं...  खैर , मेरे कक्षा के सभी सहपाठी काफी संवेदनशील हुआ करते थे .....तभी उन्हें शांत रखने के लिये मुझे अधिक जद्दोज़ेहद नहीं करनी पड़्ती थी ...बस चॉक उठाई और जिसकी आवाज़ कानों में आई उसका नाम सीधे मेरे द्वारा बेहद स्टाइलिश अक्षरों में ब्लैक - बोर्ड में आ जाता था.... जो तब तक न बिगड़ता था जब तक संबंधित विषय के अध्यापक कक्षा में आ न जाएं ....हालांकि सहपाठियों को तीन वार्निंग देने के बाद ही मैं उन पर ऐसा अत्याचार करता था.....पहली 2 बार में नाम बिगाड़ देता था परंतु फिर भी यदि वो बंदा या बंदी शरारत करता या करती तो बस उस शरारत करने वाले का नाम ब्लैक बोर्ड की शोभा बढ़ा रहा होता था ..... परंतु एक नाम जो ब्लैक बोर्ड पर कभी नही आया वो नाम था अनीश का .....बल्कि जब भी मैं किसी का नाम बोर्ड पर लिखता तो अक्सर अनीश मुझे  और फिर बोर्ड को बड़े ध्यान से देखता .... मैं काफी दिनों से यह नोटिस कर रहा था ...एक दिन बड़े ही खीजते हुए मैंने अनीश से पूछा कि, "क्या बात है ऐसे क्या देख रहे हो" ... अनीश ने मुस्कराते हुए कहा, "यार तुम्हारा लिखा हुआ एक- एक अक्षर बहुत सुंदर है मतलब तुम्हारी हैंड राइटिंग बेहद सराहनीय है".......  और मेरा क्या था मैं तो अपनी प्रशंसा सुन भीतर ही भीतर गद- गद हो गया परंतु उस वक़्त मॉनिटर के रुप में अपने सख्त मिज़ाज से बाहर नहीं आ सकता था...लेकिन उस दिन मैं समझ गया कि इस बंदे को सामने वाले की कला की कद्र है ... और जो कला की कद्र करता है ,मैं उसकी हमेशा से ही प्रशंसा करता हूँ.

धीरे- धीरे हमारी दोस्ती बढ़ी .... अनीश का स्वभाव  बेहद सरल , सिंपल , सहयोगी व  विनम्र है.......  जब मैं किसी दिन विद्यालय में अनुपस्थित होता और अगले दिन विद्यालय जाता तो सबसे पहले अनीश ही मुझे मेरी अनुपस्थिति में क्या -क्या हुआ ......मेरा मतलब है कि क्या- क्या पढ़ाया गया उसकी पूरी जानकारी बड़े ही धैर्य से बताता ......

अनीश की जन्मतिथि है 04-08-1989 और् मेरी है 03-08-1989 .. ऐसे में मैं अक्सर अनीश को इस बात के लिये irritate करने की कोशिश करता था कि तुम्हें मुझे 'भइया' कहना पड़ेगा क्योंकि मैं तुमसे एक दिन बड़ा हूँ .......मुझे लगता था मेरी इस बेतुकी सी बात से वो irritate हो जाएगा .......पर वो झट् से मुझे भइया कह देता . उसके इस कूल रवैये से मैं ही irritate हो जाता था ....
अनीश अक्सर कहता था कि, "ऋषभ ! यार यू आर रियली अ मैन आफ स्टाइल " ....खैर, मैं था भी........हम लोग अक्सर विद्यालय में होने वाले नाट्कों में भाग लेते...  हमारे विद्यालय में हुए एक नाट्क में अनीश 'यमराज' बना था ...नाट्क के अंत में उसका संवाद थोड़ा सा बोल्ड था ..... और यहाँ भी अनीश ने अपने खुराफाती दिमाग का इस्तेमाल कर स्टेज पर ही संवाद  बदल दिया .......सीन कुछ ऐसा था कि यमराज एक मानव की बात इस शर्त पर मानने को तैयार थे जब वो मानव वो वाक्य लिख दे जो यमराज उसे लिखने को कह रहे हैं ... और वो वाक्य था " गाय { पुचकारने की ध्वनी जिसे लिखा नहीं जा सकता है पर सुनने में थोड़ा अट्पटा लगता है } ...... अनीश ने वाक्य को बदल कर बना दिया " गाय हुर्र् र र र र " .......खैर नाट्क का अंत वैसे ही हुआ जैसा हम सब चाहते थे और हम सभी को दर्शकों व शिक्षकों की सराहना भी मिली ...पर अनीश को  स्टेज पर संवाद बदलने  के लिये अपने साथियों की नाराज़गी का सामना करना पड़ा ... .. हा हा हा हा हा.... यहाँ मैं ये भी लिख ही देता हूँ कि सबसे ज्यादा मेरी नाराज़गी का .......इस पर अनीश का तर्क था ....कि, "प्रिंसपल अगर निश्चित संवाद को सुन हम सभी को डाँटने लग जाते तो सबके सामने हमारी बेइज्जती ना होती और चूँकि संवाद मेरा { अनीश } था तो सबसे ज्यादा प्रिंसपल के कोप का शिकार मैं { अनीश } ही बनता " ..... ........
और मेरा तर्क था कि, "संवाद बदलने से उसका क्लाइमैक्स ही बदल गया क्योंकि  पुचकारने की वो ध्वनी  जो पहले से ही निश्चित थी , भले ही सुनने में अट्पटी लगे और प्रिंसपल की डाँट भी खिलाये पर उसे लिखा नहीं जा सकता इसके विपरीत तुम्हारे द्वारा संशोधित संवाद " हु र्र् र र र "   को आसानी से लिखा जा सकता है" ........
खैर, हम दोनों ये बहस कर ही रहे थे कि हमारा एक सीनियर आया और उसने हमारे काम की इतनी सराहना कर डाली जितनी हम दोनों को ही सुनने की आदत नहीं थी ..तो बस अपनी बहस भूल हम  दोनों दोस्त और हमारे अन्य साथी चल निकले कैंटीन की ओर सेलिब्रेशन करने .........

देखते ही देखते अनीश भी मेरे उन शीर्ष दोस्तों की लिस्ट में शामिल हो गया जो मेरे हृ्दय के करीब हैं..... मुझे उनका तो नहीं पता कि जिन्हें मैं दोस्त मानता हूँ ...उनका नज़रिया मेरे लिये कैसा है पर मेरे लिये मेरे विद्यालय के समय के कुछ साथी मेरे लिये बहुत खास हैं और इसी कारण आज भी उन चंद  लोगों से जुड़ा हूँ .....भविष्य में भी जुड़ा रहना चाहूँगा......... बाकी मैं इस सच से भी भली भाँति परिचित हूँ कि दोस्ती करना तो आसान है पर निभाना बेहद मुश्किल ................

अभी फेस बुक की कृ्पा से अनीश के साथ- साथ अन्य प्रिय दोस्तों  से काफी सालों बाद पुन: बातचीत हुई ...हम सभी ने ज़िंदगी में बहुत हद तक वो पा लिया जिसकी हमें चाह थी. कहीं ना कहीं मेरे सभी प्रिय दोस्त जो मेरे करीबी हैं वो सब खुश हैं बाकी संघर्ष तो जीवन का हिस्सा है..........
अनीश ने ब्लॉगर पर मुझे ज्वाइन कर रखा है ... कला प्रेमी अनीश ने एक दिन मेरे ब्लॉग पर Art of Portraiture पढा़ और उसने इच्छा ज़ाहिर की क्या मैं उसका एक Portrait बना सकता हूँ ...पहले तो मुझे उसकी बात मज़ाक लगी ..पर जब मुझे लगा की वो सीरियस है तो अपने दोस्त की बात को टाल दे , ये ' ऋषभ ' की फितरत नहीं.........

अनीश ने तुरंत मुझे अपनी फोटो भेजी .........फिर क्या था .... अरे जनाब ! समय मिलता नहीं ... ...समय निकालना पड़ता है .... खुशियाँ पानी है गर .......तो किया हुआ वायदा निभाना पड़ता है .......तो उसी वायदे को निभाते हुए ...कुछ पुरानी यादों को ताजा करते हुए ...बरसात के मौसम में गर्म चाय की चुसकियों के साथ इन Portraits  को तैयार किया ..... और जब पुरानी यादें ज़ेहन में आ ही गईं तब क्या था एक और चाय की प्याली के साथ इस चिट्ठे को भी उसी वक़्त तैयार कर डाला ..........

दोस्ती के अब तक के इस खूबसूरत सफर को आप सबके साथ ना बाँटता तो यह बेईमानी होती ..........तो लीजिये पेश है दोस्ती के नाम एक प्यार भरा जाम :

 







आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :

                                                      - ऋषभ शुक्ल
 

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